खुदा तेरी चाहत का ये कैसा मिसरा है
लिखता हूँ तेरा नाम और लिख जाता छपरा है.
किस दर पे तेरे आऊं सजदा करने को
तेरे दर की कोई भी राह लूँ, वो ले जाती बस छपरा है.
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खुदा तेरी चाहत का ये कैसा मिसरा है
लिखता हूँ तेरा नाम और लिख जाता छपरा है.
किस दर पे तेरे आऊं सजदा करने को
तेरे दर की कोई भी राह लूँ, वो ले जाती बस छपरा है.
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उमड़े बादल वो जो बरसने को तैयार हों तो हम भी खेतो में अपने बीज डाल दें
कुछ पैसे आ जाएँ मेरे खातों में तो हम भी शहर से गावँ की तरह मुड़ लें.
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मैं अपनी ही उम्मीदों पे खड़ा नहीं उतरा और वो मुझसे उम्मीद लगाए बैठे हैं.
दिल काटे भी तो कैसे रात को, वो हर रात किसी के मेहमान बने बैठे हैं.
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इतनी तमन्ना क्यों करता है खुदा मेरी मुश्किलों का
कोई राह बची भी नहीं अब एक तेरे दर के सिवा।।
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कितना बदल गया है इंसान, जैसे हर मोड़ पे एक पुतला है
मिलता है मेरा दिलबर अब ऐसे, जैसे अभी, यही पे मिला है.
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गाँवों के शहजादे शहरों में गुमनाम से हैं
पैसों की इतनी चाहत की इंसान अब बस साजो-सामान से है.
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बहुत मुश्किलों में हैं मेरा, जिंदगी हर मोड़ पे छल कर रही है
प्यास मेरी है की मिटती नहीं, और वो अपने वक्षों पे चोली कस रही हैं.
मुझे यूँ ही बहका के हर बार वो पीछे हट जाती हैं
मेरी मोहब्बत, मेरी प्यास सबको वो वासना कह रही हैं.
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किसी को भी यकीं नहीं उनसे मेरी मोहब्बत का
ज़माना देखता है चेहरा, नहीं दिल मेरा, ऐसा ही है हुस्न उनका।
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जुल्फों में जिनके कभी मुक्कमल था जहाँ मेरा
मेरे ही सिवा एक वो बन गया है सबका बसेरा।
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मौसम के बदल जाने से बदल जाते हो तुम
तुम्हारी सोहबत में नहीं लेकिन बदले हम.
इंसानों की बस्ती में कई इंसान भी ऐसे हैं
जिन्हे कहते भी नहीं हैं कभी इंसान हम.
इरादा ही रखते थे तन्हा होने का हम
उनको कहते ही नहीं हैं कभी बेवफा हम.
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