ए कवि, तेरे चेहरे पे
एक ग़ज़ब का नूर है।
तू ग़रीब, पर तेरी हस्ती बेजोड़ है।
एक छोटी-सी मुस्कान पे हुस्न के
तूने लिखी कितनी अदाओं की दास्ताँ।
आज ज़माने में हर तरफ़ बस
बिक रहा है सजने का सामान।
RSD
ए कवि, तेरे चेहरे पे
एक ग़ज़ब का नूर है।
तू ग़रीब, पर तेरी हस्ती बेजोड़ है।
एक छोटी-सी मुस्कान पे हुस्न के
तूने लिखी कितनी अदाओं की दास्ताँ।
आज ज़माने में हर तरफ़ बस
बिक रहा है सजने का सामान।
RSD
<blockquote class=”twitter-tweet”><p lang=”en” dir=”ltr”>In a new <a href=”https://twitter.com/NAR_Open?ref_src=twsrc%5Etfw”>@NAR_Open</a> study, <a href=”https://twitter.com/DanaFarber?ref_src=twsrc%5Etfw”>@DanaFarber</a> researchers led by <a href=”https://twitter.com/meioticdrrive?ref_src=twsrc%5Etfw”>@meioticdrrive</a> reveal how foamy virus (FV) targets DNA based on replication timing and chromatin structure.<br><br>Read more: <a href=”https://t.co/UF4IbcTSGi”>https://t.co/UF4IbcTSGi</a> <a href=”https://t.co/pmw4KXMzXB”>pic.twitter.com/pmw4KXMzXB</a></p>— Dana-Farber News (@DanaFarberNews) <a href=”https://twitter.com/DanaFarberNews/status/1932807537780215958?ref_src=twsrc%5Etfw”>June 11, 2025</a></blockquote> <script async src=”https://platform.twitter.com/widgets.js” charset=”utf-8″></script>
सब कुछ तो दे दिया खुदा ने औरत को
फिर भी औरत जाने क्या ढूंढती हैं.
हम्मे है लाख कमियां पर ठहर गए तो
फिर कोई कमी नहीं रहती है.
जा मुस्करा ले मेरी बेबसी पे
तेरी मुकर्राहट बेसकीमती हो गयी.
RSD
किसी ने पूछा — ज़िंदगी पे क्या ख़्याल है?
मैं मुस्कुराया, धीरे कहा —
वो ख़ूबसूरत थी… और मैंने शादी नहीं की।
वो क्रिश्चन थी, मैं हिंदू,
वो तमिलियन, मैं बिहारी।
वो नाज़ुक, छुईमुई सी, पतली छरहरी,
मैं — धूप में तपने वाला, सोने वाला, सतुआ खाने वाला,
उसकी उँगलियाँ किताबों के पन्नों जैसी,
मेरे हाथ — खेत की मिट्टी सने हुए।
कुछ देर ठहरी थी वो मेरी दुनिया में,
बातें- वादे, हज़ार हुईं,
मगर फिर —
एक दिन वो जो मुकर गई।
उसके बाद फिर चाहत किसी की नहीं की।
वो ख़ूबसूरत थी… और मैंने शादी नहीं की।।
न जाने क्या था उसके मन में,
या शायद सब जानकर भी अनजान थी।
मैं वहीं रह गया — अधूरा, खामोश,
किनारों सा हर पल में टूटता रहा, बिखरता रहा
मगर फिर….
यूँ किसी से घंटों वैसी गुफ्तगू नहीं की।
वो ख़ूबसूरत थी… और मैंने शादी नहीं की।
वक़्त रह गया जो मेरी हथेलियों में,
उस वक्त में वो मेरी नहीं थी.
ज़माना चुरा ले गया जो, वो राह मेरी थी।
लोग कहते रहे —
“किस्मत थी,”
“तेरी नहीं थी,”
“चल छोड़, आगे बढ़,”
मगर दिल जानता था —
वो ख़ूबसूरत थी… और मैंने शादी नहीं की।
RSD
ये ज़िन्दगी भी क्या है कि टूटे हैं थोड़ा-थोड़ा हर लम्हा,
ज़िंदा हैं कि क़लम लिखती है बस उसी को हर लम्हा।
चाहा था कि कभी तो सुकून आएगा दिल को,
पर मिलती रही बेताबी की ही सजा हर लम्हा।
आईना भी अब चेहरा देख कर है चुप सा,
बयाँ करता नहीं है मेरे दर्द का किस्सा हर लम्हा।
रिश्तों की किताबें भी अब बोझ लगती हैं,
अधूरी सी कहानी है उनमें छुपा हर लम्हा।
ख्वाबों ने भी अब आंखों से नाता तोड़ लिया,
बस बचा है सहर होने का धोखा हर लम्हा।
चल पड़े हैं सफर में मगर मंज़िलें गुम हैं,
थक कर गिरते हैं फिर संभलते हैं हर लम्हा।
दर्द भी अब अपना सा लगने लगा है,
जैसे कोई अजनबी था बना अपना हर लम्हा।
‘परमित’ लिखता है फिर भी मोहब्बत की बातें,
शायद इसी बहाने बच जाए वजूद हर लम्हा।
RSD
इश्क़ के तमाम रंग फीके पड़ गए
दर्द में दिल को जब मैंने सजाया।
जब तक वो मेरी थी मैंने चूमा जिस्म को
इस हिज्र के बाद, वो बन गया मेरा साया .
उम्मीद का कोई अंत नहीं
जंग में वो दम नहीं।
हार रहा है इश्क़ मेरा
फिर भी है ये यकीन
की वो मिलेगी किसी मोड़ पे एक दिन
बनकर मेरी, बनकर मेरी।
ना दिल रख किसी के नाम का
ना शौक कर किसी जाम का
तन्हाई में तो मांगते हैं सब
सिर्फ जिस्म, और जिस्म हाँ.
दुरी तो सित्तारों में भी है
चाँद भी तनहा है, ये सच है
तो बदनाम क्यों हैं ?
सिर्फ मेरा बिहार हाँ.
RSD
हारा हुआ ये मन विजय की कामना में है,
ना वासना में है, ना ही ये पालना में हैं।
थक चुके पाँवों को अब भी चलना ही है,
कर्तव्य-पथ पे निरंतर बढ़ना ही है।
टुटा हुआ ये मन, उड़ान की कामना में है,
हरा हुआ ये मन, विजय की कामना में है।
सपनों की गंगा बहती है दिल में प्यास लिए,
राहें कठिन सही, मन फिर भी विश्वास में हैं।
जीत की ज्योति जलती है हर इक प्रयास पे,
दूर नहीं मंजिल, सफलता बस दो हाथ पे है।
उड़ना है फिर से, नभ मेरे इन्तिज़ार में है।
RSD
नारी का सम्मान हो,
ऐसा हिन्दुस्तान हो।
शहर हो या गाँव हो,
खेत या खलिहान हो।
ना हो पाँवों में बेड़ियाँ,
ना जिस्म पे कोई घाव हो।
नारी का सम्मान हो,
ऐसा हिन्दुस्तान हो।
आते-जाते नयनों से,
घर का श्रृंगार हो।
उसके मुस्कानों से,
हर एक त्योहार हो।
ना हो डर का साया कोई,
ना अपमान की मार हो।
उसकी इच्छा, उसका सपना,
उसका भी अधिकार हो।
बोल सके वह खुले मन से,
ऐसा संवाद हो।
पढ़े-लिखे हर पंचायत में,
उसके शब्दों का मान हो।
ना हो वो सिर्फ़ रसोई तक,
उसका भी ये संसार हो।
नेता, वैज्ञानिक, सैनिक भी,
हर रूप में वो स्वीकार हो।
दया, और ममता के आगे भी
नारी की तो एक पहचान हो।
शक्ति, प्रेम, करुणा की,
जीती-जागती जान हो।
सीता जैसी सहनशीलता,
लक्ष्मी जैसा दान हो।
दुर्गा जैसी हुंकार भरी,
उसकी भी पहचान हो।
नारी का सम्मान हो,
ऐसा हिन्दुस्तान हो।
जहाँ वो जी सके खुलकर,
ऐसा आसमान हो।
RSD
हैं जो ये काली आँखें, करती हैं शरारत,
मैं पीता हूँ फिर भी, मुझे मिलती कहाँ है राहत।
कई रात गुज़ारी मयख़ाने में सोकर,
पर हर जाम पे आती है तुम्हारी आहट।
लबों पे हँसी है, मगर दिल में सिसकियाँ,
हर कूचे, हर मोड़ पे बसी है तुम्हारी चाहत।
मैं पी भी लूँ ज़हर तेरे नाम का हँस के,
मगर तू जो ना हो, तो लगती है वो भी कसरत।
तेरी यादें हैं जैसे खुशबू पुरानी,
हर सांस में घुलती है मीठी सी उलझन।
मैं टूटे ख्वाबों का प्यासा मुसाफ़िर,
तेरे नक्श पे रखता हूँ दिल की इबादत।
कभी तो सुन लेगी तू भी इस सन्नाटे को,
जहाँ हर लम्हा करता है तुझसे शिकायत।
मैं लिखता रहा अशआर तेरे नाम के,
तू समझी ही नहीं, ये मोहब्बत की ताक़त।
RSD
हैं जो ये काली आँखें, शरारत करती हैं
बात-बात पे चुपचाप इबादत करती हैं।
कभी कह दें बिना बोले ही सारी दुनिया,
कभी खामोश रहकर भी बगावत करती हैं।
इनमें छुपे हैं कई अधूरे अफ़साने,
जिन्हें पढ़ने की चाह हर दिल में पलती है।
कभी बरसें घटा बनके सावन जैसी,
कभी मुस्का के दिल की सियासत करती हैं।
जब मिल जाएँ किसी अपने की नज़रों से,
तो ये आँखें सजी संजीवनी बन जाती हैं।
और जब रूठ जाएँ ये पलकों के पीछे,
तो हज़ारों रातें सज़ा बन जाती हैं।
RSD