मंजिल


टूटने से पहले तेरी याद आयी है
ये कैसी शाम है जो तेरे बिना आयी है.
पिता बुद्धि थे, पिता ही वरदान
आज मैं तुच्छ हूँ, और लाचार
ना कोई राह है ना मंजिल
मैं भटक रहा हूँ अब दिन-रात
आज मैं शूद्र हूँ और लाचार।

RSD

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