छपरहिया कहके भूत भगाते है


हम धरती की उस मिट्टी से आते हैं
जिसके लाल धुरंधर कहलाते है.

हम धरती की उस मिट्टी से आते हैं
जो होंसलो से अपने बाँध, समंदर लेते हैं.

हम धरती की उस मिट्टी से आते हैं
जहाँ के बूढ़े भी विद्रोही बन जाते हैं.

हम धरती की उस मिट्टी से आते हैं
जहाँ के साधू छपरहिया कहके भूत भगाते है.

हम धरती की उस मिट्टी से आते हैं
जहाँ गुरु – गोविन्द सिंह जी धर्म की बिगुल बजाते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

कमरे में दिया


खूबसूरत जिस्म पे जवानी का नशा
सखी, कटती नहीं रातें अब तो बालम बिना।
आँखों का काजल सुलगता है पूरी रात
जैसे जलता है मेरे कमरे में दिया।

परमीत सिंह धुरंधर

वक्त


मेरा वक्त तेरी बाहों में कुछ इस कदर फिसला
देख रह गया है मेरी किस्मत में बस अँधेरा।

परमीत सिंह धुरंधर

चारपाई भी चूल्हा के आग लागे ला


जब – जब कोयलिया कुहके बाग़ में
मन में हुक उठे ला.

दू गो हमार नैना राजा जी
विरह में पोखर पे सांझ ढले ला.

छोड़ दी शहर के कमाई
चारपाई भी चूल्हा के आग लागे ला.

परमीत सिंह धुरंधर

कर्म


वक्त के बदलने से इंसान बदल सकता है
पर कर्म के बदलने से भगवान बदल सकता है.

परमीत सिंह धुरंधर

मिट्टी में लोटना


राम जी ने भी लक्ष्मण से कहा था, “मिट्टी में लोटना ज्यादा आनंददायक और मीठा है, वनिस्पत रण में दुश्मन को बांधना।”

परमीत सिंह धुरंधर

शराफत


शहर समझता है नादान हमें
शहर को क्या पता?
रोशन है ये शहर हमसे।

सांझ ढले वो आ जाती है छत पे
बदनाम हम हैं, मगर वो भी कब से
हैं अपनी शराफत छोड़ चुके।

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


इश्क़ मेरा समंदर सा था
मगर वो नहीं मानी।
क्यों की शक्लो-सूरत से
मैं बंदर सा था.

परमीत सिंह धुरंधर

छपरा के धुरंधर


ऐसी चढ़ी जवानी सखी,
की हाहाकार मचा दूंगी।
पतली कमर के लचक पे अपनी
सखी, चीत्कार मचा दूंगी।
तरस रहे हैं,
आरा – बलिया के बाबूसाहेब
मैं तो छपरा के धुरंधर
संग खाट बिछा लूंगीं।
मैं तो छपरा के धुरंधर संग
विवाह रचा लूंगीं।

आह उठने लगी है
मेरी गदराई जवानी पे.
खेत और खलिहान सब सखी,
अपनी चोली से सुलगा दूंगी।
तरप रहे हैं,
गोरखपुर – धनबाद के बाबूसाहेब
मैं तो छपरा के धुरंधर से
चोली सिला लूंगीं।
मैं तो छपरा के धुरंधर संग
विवाह रचा लूंगीं।

परमीत सिंह धुरंधर

दुल्हन और विराट कोहली


मंडप से दुल्हन के भाग जाने पे कैसा लगता है? आज विराट कोहली को वैसा ही लग रहा है.

परमीत सिंह धुरंधर