कि बड़ी भीड़ लगी है सैया मेरे मैके में,
सब पूछ रहे हैं तेरे घर आने पे.
अब जब निकलती हूँ इन गलियों से,
सब बुलाते हैं बैठने, घर-आँगन में.
कि बड़ी रौनक बढ़ी है सैया मेरे मैके में,
सब पूछ रहे हैं तेरे घर आने पे.
पहले भी जलती थी सब्जी चूल्हे पे,
मगर कोई कुछ कहता न था,
अभी तो खाँसी उठी नहीं,
बहने-भाभी, बैठा देतीं हैं हमें झूले पे.
कि बड़े भाव चढ़ें है सैया मेरे मैके में,
सब पूछ रहे हैं परमीत तेरे घर आने पे.
Category: Love
Every thing is related to love and beauty
नैतिकता-अनैतिकता
कि हम पागल हो गये जिनकी आँखों में झाँक के,
जाने कैसे लूट गये लोग, उनको बाहों में भर के.
कि आज तक नहीं भुला परमीत, जिस दरिया में डूब के,
जाने कैसे पार हो गये लोग, उन धरावों में तैर के.
कि मिटने लगे हैं हम जिस नैतिकता का पाठ पढ़ कर,
जाने कैसे जी रहें हैं लोग, अनैतिकता से बांध के.
रसिया
आज हमने जमाने को रसिया, आँचल के तले अपने सो लेने दिया,
चैन मिला उनको,
चैन मिला उनको, लूटने पे मेरे,
तो दिल खोल के फिर,
तो दिल खोल के फिर, हमने खुद को लूटने दिया।
आज हमने जमाने को रसिया, योवन के रस से सींच दिया,
फूल खिले उनके,
फूल खिले उनके, उजडने पे मेरे,
तो दिल खोल के फिर,
तो दिल खोल के फिर, हमने खुद को उजडने दिया।
आज हमने जमाने को रसिया, आँखों में अपने काजल बन्ने दिया,
सपने सजे उनके,
सपने सजे उनके, टूटने पे मेरे,
तो दिल खोल के फिर,
तो दिल खोल के फिर, हमने खुद को टूटने दिया।
आज हमने जमाने को रसिया, पावों में अपने मेहँदी लगाने दिया,
आँगन चमका उनका,
आँगन चमका उनका, बिखरने पे मेरे,
तो दिल खोल के फिर,
तो दिल खोल के फिर, हमने खुद को परमीत बिखरने दिया।
पिता तेरी चरणों में
पिता तेरी चरणों में, ये जीवन समर्पित है,
पास नहीं है तन के, पर मन में तू ही जीवित है.
थक के जब भी मैं रुका, दुःख के समंदर में भींग के,
नजरो को दूर तू ही नजर आता hai.
पास नहीं है तन के परमीत के,
पर रुधिर में तू ही प्रहावित है.
मन में तू ही जीवित है.
प्यास
जला कर इस दिल को
बुझा ले अपनी प्यास।
न रहूँ फिर अगर मैं,
तो ये रख तो देगा,
पास होने का अहसास, परमीत.
दर्द
दर्द में ही वो मेरी ना बनी,
खुशियों में मेरे जो दिए जलती थी.
अब सितारो का क्या करे भला परमीत,
मेरे आसमा पे जब वो ही न सजीं.
माँ और मिष्टान
बार-बार,
हर बार,
जन्म मिले मुझे,
तो तेरी गोद,
में मेरी माँ.
बार-बार,
हर बार,
खाने को मिले,
परमित को तेरी हाँथो,
पुआ-पूरी, मिष्टान.
जीवन
तेरे अंगो से इतना लगे हैं,
तन्हाई में मुस्करा रहें हैन.
तू काट ले जिसके संग भी जीवन,
अपने नसीब पे हम भी इतर रहें हैं परमित.
आँखों का रंग
उनकी आँखों का रंग खुदा,
तेरी इबादत में परमित ने पढ़ लिया.
तेरे सजदा में दर पे तेरे,
आज उनको अपना कह दिया.
काजल
वो छोड़ गयी जिस मोहब्बत को दोस्ती के नाम पे,
आज उसी को अपनी गलती बता रही है,
दोष तो हमेशा काजल का ही है, दोस्तों,
जिसे कल तक आँखों में बसाती थीं,
आज उसी को कालिख कह रहीं है, परमित.