एक गुलाब


कैसे कहें तुमसे,
वो आँखों की बात।
तुम दूर रहती हो.
पर लगती हो बड़ी ख़ास.
वो सीधे -सीधे तुम्हारा,
किताबों को देखना।
वो सखियों के बीच,
बैठे – बैठे उनको पढ़ना।
मुझे याद है अपनी,
हर वो मुलाक़ात।
तुम दूर- दूर रहती थी.
पर लगती थी बड़ी ख़ास.
वो सोमवार को तुम्हारा,
खुली जुल्फों में आना.
वो मंगलवार को,
मेरी रहे काट जाना।
वो बुधवार को प्रैक्टिकल,
में मेरे मेढक का लहराना।
वो तुम्हारे अधरों पे,
सागर की मुस्कान का उभर आना.
मुझे अब तक याद है,
वो शोख तुम्हारा अंदाज।
तुम दूर- दूर रहती थी.
पर लगती थी बड़ी ख़ास.
प्रिये, इस जीवन में अब तो,
हो नहीं सकता अपना मिलन हाँ.
जाने कैसे बुझेगी अब,
मेरे विरहा की ये आग.
बस एक ही तमन्ना है,
मेरी मौत पे आना तुम जरूर,
बस रखने एक गुलाब।
तुम दूर- दूर तो रहोगी,
पर लगोगी फिर भी बड़ी ख़ास.

परमीत सिंह धुरंधर

ऐसी थी वो सुंदरी रे


जीवन प्यासा,
राते प्यासी,
प्यास बसी है,
इन अधरों पे.
ओठों के एक चुम्बन ने,
घाव किया दिल पे गहरी रे.
रात गयी,
वो भूल गयी.
मैं बैठा रहा,
बांधे वही गठरी रे.
नैनों का नैनों से,
फिर न मिलन ये होना था.
एक ही रात में सब ले गयीं,
ऐसी थी वो सुंदरी रे.

परमीत सिंह धुरंधर

मंदिर से मयखाने


मस्ती के मेरे पैमानों का,
भी क्या अंत हुआ.
अधरों तक जाते – जाते,
दिल टूट गया.
एक ही चुम्बन में मुझे,
एहसास हुआ.
मोहब्बत में बस साँसों का,
व्यापार हुआ.
एक ही रात में वो,
सब कुछ पा गयीं।
मेरा घर-संसार,
जल कर राख हुआ.
वो मयखाने से,
मंदिर की मूरत बनी.
मैं मंदिर से मयखाने,
का जाम हुआ.

परमीत सिंह धुरंधर

कोई रखता है आज भी चोली तुम्हारी


गोरी जब से जवानी आई है,
हर तरफ से एक कहानी आई है.
कोई रखता है आज भी चोली तुम्हारी,
जिसकी सियान अब पुरानी हुई है.
हर गली, हर चौरस्ते पे,
सुबहा से होता है इंतज़ार तेरा।
जाने किस गली से तू निकलेगी,
और किन अंगों पे तेरे निशानी बनी हैं.
मत पूछ कैसे जीते हैं,
हम बेघर वाले।
हम पे तेरे आगोस की,
रूमानी अब तक छाई है.
थक के जो छूट गए,
तेरे आगोस से दूर.
उनके चेहरे पे, अब तक
वो जंगे-बईमानी खिली हुई है.

परमीत सिंह धुरंधर

पंछी


तेरी नजर के दीवाने सभी,
लूटेंगे सरसों के दाने सभी।
मेरे चबूतरे पे आके तू चर,
मुझ सा कबूतर ना मिलेगा कहीं।
तेरी कमर के दीवाने सभी,
खाने को झटके हैं तैयार सभी।
मेरे घोंसलें में तू आके रहा कर,
मुझ सा पंछी न होगा कहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

मथुरा-छपरा


सैया के बाहों में बा ऐसा नशा,
की लूट गयील मथुरा,
पर आइल मजा.
जब दोनों तरफ से तीर चले लागल,
तो धधक गईल छपरा,
पर आइल मजा.

परमीत सिंह धुरंधर

समंदर


दिल मेरा टूट गया,
समंदर में जाकर।
पर, अब भी तन्हा है समंदर,
मेरी तन्हाई को पाकर।
लहरों का धनी समंदर,
मुझ फकीर पे क्या हंसेगा।
वो समेटता है जिन मोतियों को,
मैं चलता हूँ उन्हें ठोकरों से उड़ा कर।

परमीत सिंह धुरंधर

दर्द


मेरी नज़रों में झांककर,
न देख मेरे दर्द का लिबास।
बस रातें हीं काली हैं यहाँ,
पर जल रहे है दूर तक चिराग।

परमीत सिंह धुरंधर