काजल


गम में डूबी मेरी रातों को,
तेरी आँखों का काजल बन जाने दे.
कुछ नहीं मेरे महबूब,
तो अब अपनी आगोस में मुझे पनाह लेने दे.
जब से देखा है तुझे इन आँखों ने,
अब इन्हे किसी मंजिल की चाह नहीं।
मिटने का गम हम राजपूतों को नहीं,
मगर मुझे मिटा दे तू,
मेरे सीने पे ऐसा खंजर उतर जाने दे.
तेरे ओठों की लालसा,
अब जिंदगी से ज्यादा है.
विष ही सही,
पर, अब इन्हे मुझे चख लेने दे.

परमीत सिंह धुरंधर

चोली ए रानी


आव अ उघार दीं,
चोली ए रानी,
आव अ उघार दीं चोली।
फेन पहन ली ह अ भिनसहरा,
जाएब हम जब कोतवाली।
आव अ उघार दीं,
चोली ए रानी,
आव अ उघार दीं चोली।
इहाँ ना कोई हाड्डा आई,
ना तितैया ही कोई काटी।
मत डर अ तू,
हम करेम रात भर रखवाली।
आव अ उघार दीं,
चोली ए रानी,
आव अ उघार दीं चोली।

परमीत सिंह धुरंधर

तनी रहे दीं सियन चोली के


तनी धीरे -धीरे छुईं राजा जी,
अभी – अभी त अ जवानी आइल बा.
तनी रहे दीं,
तनी रहे दीं सियन चोली के,
दर्ज़ी लगन में बाहर गइल बा.
काहे ऐसे, काहे ऐसे बउराइल बानी,
सारा धन त अ रउरे खातिर बा.
तनी रहे दीं,
तनी रहे दीं कुछ थाती राजा जी,
अभी कउन उमर भइल बा.
काहे ऐसे, काहे ऐसे भुखाइल बानी,
सारा त अ दही जामल बा.
तनी रहे दीं,
तनी रहे दीं कुछ छाली राजा जी,
घिउवा बड़ा महंग भइल बा.

परमीत सिंह धुरंधर

एक गुलाब


कैसे कहें तुमसे,
वो आँखों की बात।
तुम दूर रहती हो.
पर लगती हो बड़ी ख़ास.
वो सीधे -सीधे तुम्हारा,
किताबों को देखना।
वो सखियों के बीच,
बैठे – बैठे उनको पढ़ना।
मुझे याद है अपनी,
हर वो मुलाक़ात।
तुम दूर- दूर रहती थी.
पर लगती थी बड़ी ख़ास.
वो सोमवार को तुम्हारा,
खुली जुल्फों में आना.
वो मंगलवार को,
मेरी रहे काट जाना।
वो बुधवार को प्रैक्टिकल,
में मेरे मेढक का लहराना।
वो तुम्हारे अधरों पे,
सागर की मुस्कान का उभर आना.
मुझे अब तक याद है,
वो शोख तुम्हारा अंदाज।
तुम दूर- दूर रहती थी.
पर लगती थी बड़ी ख़ास.
प्रिये, इस जीवन में अब तो,
हो नहीं सकता अपना मिलन हाँ.
जाने कैसे बुझेगी अब,
मेरे विरहा की ये आग.
बस एक ही तमन्ना है,
मेरी मौत पे आना तुम जरूर,
बस रखने एक गुलाब।
तुम दूर- दूर तो रहोगी,
पर लगोगी फिर भी बड़ी ख़ास.

परमीत सिंह धुरंधर

ऐसी थी वो सुंदरी रे


जीवन प्यासा,
राते प्यासी,
प्यास बसी है,
इन अधरों पे.
ओठों के एक चुम्बन ने,
घाव किया दिल पे गहरी रे.
रात गयी,
वो भूल गयी.
मैं बैठा रहा,
बांधे वही गठरी रे.
नैनों का नैनों से,
फिर न मिलन ये होना था.
एक ही रात में सब ले गयीं,
ऐसी थी वो सुंदरी रे.

परमीत सिंह धुरंधर

मंदिर से मयखाने


मस्ती के मेरे पैमानों का,
भी क्या अंत हुआ.
अधरों तक जाते – जाते,
दिल टूट गया.
एक ही चुम्बन में मुझे,
एहसास हुआ.
मोहब्बत में बस साँसों का,
व्यापार हुआ.
एक ही रात में वो,
सब कुछ पा गयीं।
मेरा घर-संसार,
जल कर राख हुआ.
वो मयखाने से,
मंदिर की मूरत बनी.
मैं मंदिर से मयखाने,
का जाम हुआ.

परमीत सिंह धुरंधर

कोई रखता है आज भी चोली तुम्हारी


गोरी जब से जवानी आई है,
हर तरफ से एक कहानी आई है.
कोई रखता है आज भी चोली तुम्हारी,
जिसकी सियान अब पुरानी हुई है.
हर गली, हर चौरस्ते पे,
सुबहा से होता है इंतज़ार तेरा।
जाने किस गली से तू निकलेगी,
और किन अंगों पे तेरे निशानी बनी हैं.
मत पूछ कैसे जीते हैं,
हम बेघर वाले।
हम पे तेरे आगोस की,
रूमानी अब तक छाई है.
थक के जो छूट गए,
तेरे आगोस से दूर.
उनके चेहरे पे, अब तक
वो जंगे-बईमानी खिली हुई है.

परमीत सिंह धुरंधर