मुसाफिर


सारे रिश्ते खामोस हो गए,
हम किसी राह पे,
वो किसी राह के मुसाफिर हो गए.
न कोई खबर, न इल्तिजा,
हम तो तन्हा ही हैं,
पर सुना है,
उनके लाखों रिश्तेदार हो गए.

परमीत सिंह धुरंधर

2 thoughts on “मुसाफिर

Leave a comment