नशा जीवन का


कहाँ है वो नशा जीवन का?
वो खुशियाँ, वो मस्ती,
वो मज़ा जीवन का.

वो रिश्तेदारों के कहकहे,
वो दादा – दादी की कहानियाँ।
वो नौक – झौंक,
वो रुस्सा – रुसववाल।
वो आँगन में दो चूल्हे,
और एक थालियाँ।

कहाँ है वो नशा जीवन का?
वो खुशियाँ, वो मस्ती,
वो मज़ा जीवन का.

वो खपरैल के घर में,
खुले आँगन में,
गीत गाती लड़कियाँ।
सिलवट पे हल्दी पिसती,
चूल्हे पे खांसती,
वो जाँत और मुसल,
चलाती भाभियाँ।

कहाँ है वो नशा जीवन का?
वो खुशियाँ, वो मस्ती,
वो मज़ा जीवन का.

वो दो पतोह की सास बन चुकी,
ससुराल से मायके आयी,
लड़की को देखने उमड़ी भीड़.
और उस भीड़ में,
बूढ़े हो चले दामाद को,
दबाती, चींटी काटती नारियाँ।

कहाँ है वो नशा जीवन का?
वो खुशियाँ, वो मस्ती,
वो मज़ा जीवन का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

एक पगली लड़की के अरमान देखिये : भाग – 2


एक पगली लड़की के अरमान देखिये,
बिना चूड़ी, बिना कंगन के,
बिना पायजेब के उसका श्रृंगार देखिये।

एक टकटकी सी लग जाती है,
जब वो निकलती है.
कच्ची उम्र में ही,
उसके अंगों का मल्हार देखिये।

अधर खुलते नहीं, और वो सब कह जाती है.
अधखुली पलकों से सब का मन मोह जाती है.
नाजुक तन – बदन पे, यौवन का,
प्रबल -प्रखर, प्रवाह देखिये।

एक पगली लड़की के अरमान देखिये,
इस वीराने, उरस जमीन पे एक गुलाब देखिये।

 

परमीत सिंह धुरंधर

तिल


नहीं झीलें हैं, नहीं हैं तलाबें,
जोड़े बैठते हैं अब,
ऊँची – ऊँची मॉल में.
कहाँ जाएँ गुरैया, कहाँ जाएँ परिन्दें?
ना वृक्ष हैं, ना हैं कहीं घोंसले।

अब जवानों की बस्ती है,
और बूढ़ों को मिल गए हैं वृद्धालय।
ना बैलगाड़ी है, ना ताँगें,
अब तो मोबाइल और फेसबुक पे,
पढ़े जाते हैं प्रेम के कसीदें।

अब कहाँ इंतज़ार करना पड़ता है?
दुपट्टा गिरने और घूँघट के उठने का.
अब तो सीधे देख लेते हैं लोग,
तिल वक्षों पे और मुखड़े के उनके।

 

परमीत सिंह धुरंधर

पति को सबसे अच्छा बताती हैं


मत पूछो दरियावों से समंदर का पता,
ये तो सीधी राहों को भी टेढ़ा बना देती हैं.

हुस्न क्या कहेगा, की वफ़ा क्या है?
ये तो तीस के बाद शादी, और शादी के बाद,
पति को सबसे अच्छा बताती हैं.

यूँ ही नहीं पाला है कुत्तों का शौक मैंने,
किसी के भी कुत्ते को वो गले लगा लेती हैं.

उनसे क्या पूछते हो दोस्त इश्क़ में कुछ भी?
वो तो,
दौलत के लिए किसी को भी शौहर बना लेती हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जब बारू एक के खाट पे


लूट ले ब अ का हो सैयां आज एके रात में?
तानी त धीरज धर अ, अब त बानी उम्र भर तहरे साथ में.

अंग – अंग ताहर, खिलल- खिलल, हंसुआ के धार नियर,
कैसे रखीं धीरज रानी, तुहीं कह द, जब बारू एक के खाट पे?

त तोड़ दे ब अ का हो सैयां आज खटिया एके रात में?
तानी त धीरज धर अ, अब त बानी उम्र भर तहरे साथ में.

अंग – अंग ताहर, खिलल- खिलल, हंसुआ के धार नियर,
कैसे रखीं धीरज रानी, तुहीं कह द, जब बारू एक के हाथ पे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

एक पगली लड़की के अरमान देखिये


एक पगली लड़की के अरमान देखिये,
दर्पण में देखती अपने ही अंगों को,
गरीबी के चादर में,
प्रकीर्ति का अद्भुत श्रृंगार देखिये।

भारत की धरती पे,
किसी जगह के एक कोने में,
कुपोषित बचपन पे,
भारी यौवन का प्रहार देखिये।

नित – नित खिलती जा रही,
माँ – बाप के आँखों की नींदें उड़ाती,
भुखमरी के आँगन में,
प्रस्फुटित ये ज्वार देखिये।

 

परमीत सिंह धुरंधर

Crassa के शयनकक्ष के झरोखे से : भाग – प्रथम


मैं बिस्तर पे बैठे कुछ पढ़ रहा था. तभी दरवाजा खोलते ही रश्मि दरवाजे पे ही ठिठक गयी. चौंकते हुए, आवाज में खीज की खरास रख कर वो बोली, “अरे ८ बजे ही चढ़ गए.”
मैंने देखते हुए उसे कहा, ” हाँ मुझे बहुत नींद आ रही है. तुम भी आ जाओ, जल्दी सोते हैं.”
रश्मि, “सब जानती हूँ मैं तुम्हारी नींद को. ३ बजे तक ना सोओगे खुद, ना सोने दोगे किसी को. हर रोज का एक ही आदत है. मैं नहीं आउंगी, बहुत काम है मुझे।”

उसके बाद रश्मि दर्पण के सामने बैठ के श्रृंगार करने लगी. मुझे पता है अब वो दो – तीन घंटे तक नहीं उठने वाली। पर ये नहीं समझ पाया की ये रात में श्रृंगार करती क्यों है? बाकी सारी औरत जन दिन में करती है, कहीं जाने पे करती हैं. आखिर धीरज खोकर मैंने आज पूछ ही लिया, ” ये तुम रोज रात में इतना सजती – सवरती क्यों हो, किसके लिए? बाकी लोग तो दिन में बाहर जाने पे श्रृंगार करती हैं.”
रश्मि,”ओह्ह्ह हो, तो अब दूसरे का श्रृंगार देखा जा रहा है की कौन कब सज रहा है? मैं तुम्हारी तरह नहीं हूँ जो दुसरो को देखूं और दिखाऊं।”
मैं, “अरे मैं तो बस ये नहीं समझ पता हूँ की तुम यहाँ बैठ के बिस्तर पे श्रृंगार क्यों नहीं करती। और ये मैं बुला रहा हूँ तो भी अब चार – चार घंटे तुम पता नहीं क्या करती हो? मुझे नींद आ रही है. सो जाऊँगा फिर.”
रश्मि, “सो जावों, मुझे बहुत काम हैं.”
आखिर मैं सो गया और पता नहीं रश्मि कब आकर लेट गयी.

अगले दिन, मैंने शाम को दोस्तों के साथ कुछ प्रोग्राम बनाया। जैसे ही आज जल्दी निकला ऑफिस से, तीन बजे, ताकि दोस्तों को सहूलियत रहे उनके घर जाने में भी, वैसे ही रश्मि का फ़ोन आ गया.
मैं, “हाँ, बोलो।”
रश्मि, “अरे तबियत तो ठीक है.” मैंने कहा की हाँ ठीक हूँ, मुझे क्या हुआ?
रश्मि,”तो ऐसे क्यों बोल रहे हो? नींद पूरी हई थी न तुम्हारी रात को.”
मैं, “हाँ मैं तो ११ बजे सो गया था. फिर क्यों पूरी नहीं होगी?”
थोड़ी देर शांत रहकर उसने कहा की अच्छा आज जल्दी घर आ जावों। मैंने कहा की मैं जल्दी आकर क्या करूँगा? मैंने उसे बोला की आज दोस्तों के साथ प्रोग्राम बन गया है, इसलिए मैं उनसे मिलने जा रहा हूँ.
मैं, “और वैसे भी तुम को बहुत काम रहता है. सो तुम उन्हें निपटा लो, तब तक मैं आ जाऊँगा।”
रश्मि, “अरे, मैंने आज सब काम जल्दी ख़तम कर दिया है. सोचा, तुम रोज कह रहे हो, तो आज तुमसे बाते करुँगी और जल्दी सो जाउंगी। वैसे भी तुम्हारे चलते रोज सो नहीं पाती।”
मैं, “मेरे चलते या तुम खुद ही लेट से सोती हो.”
रश्मि,”अरे तो कोई क्या करे? तुम्हारी तरह बिस्तर पे शाम से ही कब्जा कर लूँ और लड़ूँ तुमसे।”

रश्मि,”देखो मैंने, खाना बना दिया है आज तुम्हारे लिए. जल्दी – जल्दी किया, मेरा पूरा शरीर दुःख रहा है. ताकत नहीं है की रात भर बैठ कर तुम्हारा इंतज़ार करू। मैंने सब काम करने के चक्कर में आज दोपहर का खाना भी नहीं खाया की एकसाथ अब रात को तुम्हारे साथ ही खा लुंगी।”
रश्मि,”लेकिन तुम्हे ना मेरा ख्याल है ना प्यार। चलो, दोस्तों के साथ मजे करों, यहाँ बीबी मरे तो मरे. हाँ और सुनो, आज रात उन्ही के साथ रुक जाना, या होटल में सो जाना।”

आश्चर्य में पड़ते हुए, मैंने पूछा ये क्यों?
रश्मि, “अरे बोली तो, आज पूरा शरीर टूट रहा है. लगता है की नींद नहीं टूटेगी, इतनी थकी हूँ की, और मैं दरवाजा नहीं खोल पाउंगी। तुम्हारे लिए बोल रहीं हूँ की ताकि तुम्हे रात में दिक्कत ना हो बाहर खड़े रहने में.”
रश्मि,”कोई अपने यार को नहीं बुलाया है तुम्हारी तरह, जो तुम्हे घर आने से मना कर रही हूँ.”
और ये कहते ही फ़ोन रख दिया उसने। पांच मिनट सोच के मैंने दोस्तों को सूचित किया रश्मि की तबियत बिगड़ गयी है. मैंने उनसे माफ़ी मांगी ये कह कर की मुझे उसे डॉक्टर के पास ले के जाना है.
वापस घर जाने के लिए निकल पड़ा. मुझे पता है आज बिस्तर पे ५ बजे से बैठना पड़ेगा और उसका श्रृंगार आज ५ बजे से ही शुरू हो जाएगा।

मन मेरा ये ही सोच रहा था की जाने कैसे इस औरत को हर बार पता चल जाता है की मैंने कोई और प्रोग्राम बनाया था और बहार जा रहा हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

एक कर्ज है बस तेरा ही बहना,


हम तोमर हैं,
हम राजपूत हैं.
हमारा गौरव है,
इतिहास भरा है,
हमारे साहस से.

हमारे पिता भी लड़ाकू थे,
रौंदा था दिल्ली को,
कई बार, बुढ़ापे में.
पर एक कर्ज है बस,
तेरा ही बहना,
इस चकर्वर्ती घराने पे.

हर बेटी,
ले गयीं दौलत ढ़ो – ढ़ो कर.
कभी दुःख बता कर,
तो कभी रो – रो कर.
बस तूने ही डाला था पर्दा,
हमारी खाली तिजोरी,
और टूटती दीवारों पे.

तू नारी नहीं, तू अबला नहीं।
ना किस्मत की कोई धारा है.
तू उस महारथी पिता की तेजोपुंज है,
जिसकी खडग थी तू,
उसके आखिरी समर में.

तू दीप नहीं जिसकी लौ,
हवाओं के दुआ पे.
तू चाँद नहीं जिसका अस्तित्व,
बस सूरज के छुपने पे.
तू उस महारथी पिता की पुत्री है,
दिशाएँ गूंजती थी जिसकी दहाड़ पे.
बस एक तेरा ही कर्ज है बहना,
उस चकर्वर्ती के इस घराने पे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्रेम और प्रजनन


क्या होता अगर वो मिल जाती?
दो बच्चे हो जाते,
दोस्तों में मेरे थोड़े किस्से हो जाते।
और क्या होता?
चलो दो ना सही,
चार हो जाते।
उसके आगे क्या होता?

खाने को दाल – रोटी मिलती,
सब्जी थोड़ी स्वादिस्ट बनती।
पर उसके आगे क्या?
बिस्तर पे चादर थोड़ी सुगन्धित होती,
मेरी कमीज – पेंट थोड़े सलीके के,
और दाढ़ी सफाचट होती,
पर उसके आगे क्या होता?

ससुराल वाले थोड़ा मान – दान देते,
साली थोड़ी घरवाली होती,
पर उसके आगे क्या?
कुछ दिनों बाद जब सब फीका होता,
तो उसके आगे क्या?

ध्येय अगर ना प्रजनन हो,
तो प्रेम का कोई अस्तित्व नहीं।
अंगों से अंग टकराना,
इसमें तो कोई विजय नहीं।
पौरस, जवानी, यौवन, जो कह लो
अगर इनकी मजिल सिर्फ नारी है,
तो उसके आगे क्या?

 

परमीत सिंह धुरंधर

बटन टूट रहा है


वक्त कुछ ऐसे मुझ पे सितम कर रहा है,
की हर शख़्स मुझसे मुख मोड़ रहा है.
क्यों ना हो शहर में चर्चा तेरे हुस्न का?
हर रात जो तेरी चोली का बटन टूट रहा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर