मेरे बैलों को कोई पशु ना कहे


उनके जिस्म पे जो
ये गहने हैं
पैसों से तो सस्ते
पर पसीने से बड़े महंगे हैं.

कैसे उतार के रख दे?
वो ये गहने अपने जिस्म से
चमक में थोड़ी फीकी ही सही
मगर इसी चमक के लिए
मेरे बैल दिन – रात बहते हैं.

मेरे बैलों को कोई पशु ना कहे
हैं की उन्ही के बल पे
मेरे घर के चूल्हे जलते हैं
और उनके कर पे वस्त्र
और गहने चमकते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

2 thoughts on “मेरे बैलों को कोई पशु ना कहे

Leave a reply to Madhusudan Cancel reply