जियो – जियो हे अम्बानी


दौलत की ऐसी बरसात
ना पहले देखि थी
ना शायद देख पाउँगा।
जियो – जियो हे अम्बानी
जुग – जग जियो हे अम्बानी।

कौन -कौन नहीं आया?
कौन – कौन नहीं नाचा?
तुम लग रहे थे इंद्रा
और नीता इंद्राणी।
जियो – जियो हे अम्बानी
जुग – जग जियो हे अम्बानी।

सोने की चिड़िया थी
कभी ये धरती अपनी भी
ऐसा पढ़ा और सूना था.
तुमने हकीकत में बदल दी
इतिहास की वो कहानी।
जियो – जियो हे अम्बानी
जुग – जग जियो हे अम्बानी।

परमीत सिंह धुरंधर

पर तेरा नाम लेते हैं


तेरी आँखों की कसम खाते हैं
तन्हाई में जी रहे पर तेरा नाम लेते हैं.

तुम मिलो कभी तो तुम्हे बता दें
वो शरारत थी बस तुम्हारे लिए.

सैकड़ों मिटे तो उनकी हैसियत बनी
ये शहर उनका हुआ, हमारी गरीबी रही.

परमीत सिंह धुरंधर

जन्नत में ७२ हूरों के साथ


वो हमको बारूद, उनको संदूक दे गए
जन्नत में ७२ हूरों के साथ के लिए
मासूमों के हाथों में बन्दूक दे गए.

कहते हैं की वहाँ जवानी ढलती नहीं
और हूर बाहों से दूर छिटकती नहीं।
उस परुषार्थ-विहीन, माँ के दूध रहित
जवानी के लिए, माँ की गोद सुनी कर गए.

परमीत सिंह धुरंधर

किसके लिए?


अजीब दास्ताँ है ये, खुद हमारे लिए
ये शहर मेरा नहीं तो मुस्करायें किसके लिए?

दफ़न कर चूका हूँ जो ख्वाइशें कहीं
उन्हें सुलगाऊँ भी तो अब किसके लिए?

वो छोड़ गयीं मुझे एक ही रात के बाद
अब घर बसाऊं भी तो किसके लिए?

यादों का गठबंधन तोड़े कैसे पिता?
जब तुम ही नहीं तो जीयें किसके लिए?

खुदा भी जानता है की हम है अकेले
खुशियाँ बाटूँ भी तो किसके लिए?

जमाने से दुश्मनी है मेरी सदियों से
जमाने से बना के रखूं भी तो किसके लिए?

मुबारक हो हिन्द, जिन्हे मंदिर – मस्जिद चाहिए
मैं सजदा करूँ भी तो अब किसके लिए?

परमीत सिंह धुरंधर

न करे खर्च एक रुपया


काला – काला सैया मेरा
जैसे कोई कउआ.
दिन भर करे टर्र – टर्र
रात में चढ़ा के पउआ.

दुःख का पहाड़ टूटा है सखी
जाने क्या देख, बाबुल बाँध गए पल्ला?
मेरी भारी जवानी पे
न करे खर्च एक रुपया।

परमीत सिंह धुरंधर

फलसफा


तन्हा रह गया सवरने में
और उम्र गुजरी तो दर्पण भी टूट गया.

जिंदगी का फलसफा बस यूँ ही रहा
की जिसे गले लगया, वो ही खंजर उतार गया.

परमीत सिंह धुरंधर

Crassa किताब ही नहीं रखता


कौन है जो किताबों में तस्वीर नहीं रखता?
ये बस Crassa है जो किताब ही नहीं रखता।

वो उम्र भर की मोहब्बत जो ना मिल सकी
उन्हें भी पता है की मैं कोई और चाहत नहीं रखता।

बहुत खौफ में है ये शहर
की हर कोई अनजान है लगता.

दिल इस कदर डूबा हूँ दर्द में
की दूर – दूर तक कुछ और नहीं दिखता।

परमीत सिंह धुरंधर