आनंद


जो पतित है, वही पावन भी है.
जो मलिन है वही पारस भी है.

जलता है दिया जमाने के लिए
पर उसके लिए बस अन्धकार ही है.

क्या माँगूँ खुदा तेरे दर पे यहाँ?
जब आंसुओं में मेरे तेरा साया भी है.

तू जी कर गया, बनके मानव यहाँ
पता है तुझे, इस पीड़ा में ही प्यार भी है.

तू ठगता रहे, तू छलता रहे, शिकवा नहीं तुझसे
इस छलावे में ही मिलता आनंद भी है.

एक ही खुदा सबका, एक ही पीड़ा सबकी
इसी पीड़ा ने तुझसे सबको बांधा भी है

परमीत सिंह धुरंधर

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