तू काली – काली सी
पर लगती है कोई हीर.
कभी अकेले में मुझसे मिल
संग लगाएंगे कचहरी।
जितना तुझे देखता हूँ
उतनी तू भा रही.
ये नशा है मेरा
या तेरी जादूगरी।
परमीत सिंह धुरंधर
तू काली – काली सी
पर लगती है कोई हीर.
कभी अकेले में मुझसे मिल
संग लगाएंगे कचहरी।
जितना तुझे देखता हूँ
उतनी तू भा रही.
ये नशा है मेरा
या तेरी जादूगरी।
परमीत सिंह धुरंधर
ना दौड़ा करों यूँ उछल – उछल के
की वक्षों पे सागर लहरा गया.
मन तो मेरा फ़कीर है पर
देख के तुमको ठहर गया.
अभी -अभी तो चढ़ी जवानी
अभी से मौसम बदल गया.
मन तो मेरा फ़कीर है पर
देख के तुमको ठहर गया.
परमीत सिंह धुरंधर
तू न मिली इस जीवन में, अगले जीवन का क्या पता?
दर्द बहुत है, पर प्रिये तुझे पाने के लिए, मैं लौटूँगा।
परमीत सिंह धुरंधर
कब तक बहलाओगी किताबों से खुद को?
वो बचपन का दौर था, ये जवानी का दौर है.
आँखों के शर्म को पलकों पे रहने दो
वो घूँघट का दौर था, ये निगाहों का दौर है.
परमीत सिंह धुरंधर
जो तन्हा है
वो Crassa तो नहीं है.
जिसे प्यार मिल गया
उसे वक्त ने तरासा तो नहीं है.
दो-बूंदों में लहलहा जाए जो फसल
उसमे किसान का पसीना तो नहीं है.
जिन्हे अपने इतिहास का ज्ञान नहीं
उन राजपूतों की कोई गाथा तो नहीं है.
हर शहर की किस्मत में मेरा साथ नहीं
ऐसा शहर भी नहीं, जहाँ मेरी चर्चा नहीं है.
छपरा की मिट्टी पे जो भी फूल खिला
उसे हवाओं ने बांधा तो नहीं है.
परमीत सिंह धुरंधर
वो मोहब्बत की बातें, वो शरारत की रातें
खुदा जानता है, हमें आज भी हो तुम याद.
गुनाहों में साथ थे, पनाहों में साथ थे
बस किस्मत में ही नहीं लिखा था साथ.
तुम जाने कैसे जीने लगे हमसे दूर होकर
हमें तो साँसें भी लगती हैं अब दुश्वार।
ये निगाहें अब भी तुम्हे ढूंढती हैं
और कब तक तुम्हे देते रहें आवाज।
परमीत सिंह धुरंधर
जब गुजरता हूँ शहर के करीब से
तो बहुत याद आती हैं वो खाटों की लोरियाँ।
मैं तन्हा ही रह गया शहर में घुल के
इनसे अच्छी तो थी वो चुभती बालियाँ।
कौन कहता हैं की जिंदगी खुद की हाथों से संवरती हैं?
मैं भी जानने लगा हूँ कौन खींचता हैं ये डोरियाँ?
परमीत सिंह धुरंधर
मुझे शरारत सूझी
जवानी में
तो उनसे मोहब्बत हो गयी.
एक रात का सफर था
मगर अब ये आदत हो गयी.
परमीत सिंह धुरंधर
जिंदगी का नशा है जमीन से जुड़ने में
वरना आसमान तो पंखों को बस थकान देता है.
जितनी भी ऊँची हो उड़ान
आसमान पंक्षी को कहाँ विश्राम देता है?
परमीत सिंह धुरंधर
मेरी उम्र का सिला देखिये
बहकते कदम, झुकी नजर देखिये।
मेरी उम्र का सिला देखिये
कपकपाते अधर, बलखाती कमर देखिये.
हसरते जवान, बेचैन धड़कने-२
रातों का इनका कहर देखिये।
मेरी उम्र का सिला देखिये।।
ना नैनों में नींद, ना मीठा कोई स्वप्न
मचलते अरमानों के सेज की दाहक देखिये।
मेरी उम्र का सिला देखिये।।
मेरी उम्र का सिला देखिये
हसीं गालों पे जुल्फों का भंवर देखिये।
मेरी उम्र का सिला देखिये।।
टूटे तारे रात भर जिसकी मोहब्बत में
उसके हुस्ना का ये सहर देखिये।
मेरी उम्र का सिला देखिये।।
बरसते बादल, चमकती बिजली
अम्बर में ये जुगल देखिये।
मेरी उम्र का सिला देखिये।।
परमीत सिंह धुरंधर