ए हिन्द तुझे सजाऊंगा मैं


ए हिन्द,
तुझे सजाऊंगा मैं.
इसलिए नहीं की तू मेरा है,
बल्कि इसलिए की तू अनोखा है.
दिव्यज्योति है तू इस संसार का,
चमकता है तुझसे ही,
भाल मानवता का.
ए हिन्द,
तुझे सवारूँगा मैं.
इसलिए नहीं की तू अकेला है.
बल्कि इसलिए की तू अलबेला है.
चाँद है तू जीवन के आसमान का,
बिन तेरे अंधेरो में है हर जहाँ।
ए हिन्द,
तुझे सम्भालूंगा मैं.
इसलिए नहीं की मुझे लालच है कोई,
बल्कि इसलिए की तू मेरा गर्व है.
तुझे छोड़ के चाहे जितने भी चले जाए,
दूर किसी के दामन में बसने।
जितने भी चाहे, इल्जाम लगा लें,
अहिषुण्ता का तुझपे।
ए हिन्द,
लौट के आऊंगा मैं.
इसलिए नहीं की मेरा कोई आसरा नहीं है.
बल्कि इसलिए की मुझे तू प्यारा बहुत है.

परमीत सिंह धुरंधर

लक्ष्य


सबका हित हो,
सबका कल्याण हो.
मानव के संग,
मानवता का विकास हो.
न किसी का शोषण हो,
न कोई शोषित ही रहे.
भारत वर्ष में,
जन-जन का उत्थान हो.
ना कोई बच्चा दूध को तरसे,
ना बूढें अब भोजन को.
शिक्षित – अशिक्षित सबका,
सबपे हक़ अब सामान हो.
किसी एक के आंसू पे,
ना दूसरे का मुस्कान हो.
भारत वर्ष में,
जन-जन का उत्थान हो.
मानव के संग,
मानवता का विकास हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

भारत और औरत


हम रंग देते हैं दीवारों को,
पर मेरे पास कोई घर नहीं।
हम लड़ते है सरहद पर,
मेरे अपनों के पास एक छत नहीं।
हम उपजाते हैं आनाज,
अपने पसीनें को जलाकर।
और हमारे बच्चो को,
खाने को भोजन नहीं।
ये देश है बुध-महावीर का,
भारत इसका नाम है.
जहाँ बिकती है नारियां,
और औरतों का सम्मान नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

सोलह साल


१५ ऑगस्त पे,
ए कलम,
क्या लिखूं,
आज.
तेरी ही स्याही,
अलख जगाती,
और,
गिराती है ताज.
क्या कहूँ उनपे,
जो जला गए स्वाधीनता,
की आग.
क्या नापूँ उनको,
जो माप गए सूरज,
और चाँद।
ये कोई चन्द बिन्दुओं,
को मिलाती रेखा नहीं,
ये तो वो मानचित्र है,
जिसपे लूटा दी,
माताओं ने पानी गोद,
और सुहागिनों ने,
अपनी सुहाग।
ए कलम,
क्या लिखूं,
उन वीरांगनाओं पे,
आज.
जिन्होंने जौहर खेली,
जब उम्र थी, केवल
सोलह साल.

परमीत सिंह धुरंधर 

धरती भारत की


जहाँ गंगा की हर धार में,
खेलती है जवानी,
वो धरती है भारत की,
जहाँ वीर हुए बलिदानी।
जहाँ शंकराचार्य ने,
वेद गढ़े,
और नानक ने,
दिए गुरुवाणी।
वो धरती है भारत की,
जहाँ वीर हुए बलिदानी।
जहाँ पहन केशरिया,
भगत सिंह, निकले दुल्हन लाने,
और जीजा बाई ने दी,
शिवा जी को शिक्षा अभिमानी।
वो धरती है भारत की,
जहाँ वीर हुए बलिदानी।

परमीत सिंह धुरंधर 

माँ और भगत सिंह


तेरा वैभव मेरी माँ,
हैं तेरी ये मुस्कान।
न चिंता कर,
मेरी इस देह की,
ये जगा जायेगी,
सारा हिंदुस्तान।
मैं रहूँ या न रहूँ,
कल की सुबह में।
पर जलती रहे,
तेरे चूल्हे में,
हरदम ये आग।

परमीत सिंह धुरंधर