गुस्ताखियाँ


मैंने चाहा जिस समंदर को
उस समंदर की अपनी हैं गुस्ताखियाँ।

जिन लहरों पे मैंने बिखेर दिया पाने ख्वाब
वो ही लहरें डुबों गयीं मेरी किश्तियाँ।

मजधार में मुझे बाँध कर
साहिल पे बसा रहीं हैं गैरों की बस्तियाँ।

परमीत सिंह धुरंधर

उसकी आँखों में क्या दर्द दे गए?


जिसे खेत में लूट कर तुम नबाब बन गए
उससे पूछा क्या कभी?
उसकी आँखों में क्या दर्द दे गए?
एक चिड़िया
जिसने अभी सीखा नहीं था दाना चुगना
तुम दाने के बहाने जाल डालके
उसका आसमान ले गए.
कई रातों तक देखती थी जो ख्वाब
घोनषलॉन से निकल कर एक उड़ान भरने का
उसके पंखों को बाँध कर
तुम उसका वो सारा ख्वाब ले गए.

परमीत सिंह धुरंधर

हमसे पूछिए शहर में नया क्या है?


हमसे पूछिए शहर में नया क्या है?
कहीं नजरें लड़ रहीं हैं,
कहीं मयखाना खुला है.’

हमसे पूछिए शहर में नया क्या है?
कोई पत्र लिख रहा है
कोई डाकिया बना है.

हमसे पूछिए शहर में नया क्या है?
इशारों – इशारों में संदेस जा रहे हैं
कहीं चुनर फंसी है, कहीं दुप्पटा उड़ा है.

हमसे पूछिए शहर में नया क्या है?
खुदा ने दे दी उनपे नजाकत
कहीं शमा जली है, कहीं अँधेरा हुआ है.

परमीत सिंह धुरंधर

पिघलता क़यामत


जो नजर में आ जाए वो ही नजाकत है
बाकी सब तो परदे के पीछे एक सियासत है.

उनका पर्दा है ए जमाना तुम्हारे लिए
मेरी बाहों में तो हर रात पिघलता क़यामत है.

परमीत सिंह धुरंधर

बस दो बून्द ढलका दिया


मेरी उम्र गुजर गई जिस मयखाने में
वहीँ पे शहर ने अपना गुलशन बना लिया।

ता उम्र हम जिसके पिघलते रहे
उस हमनवाज ने मेरी मौत पे
बस दो बून्द ढलका दिया।

परमीत सिंह धुरंधर

मधुबन में तुमसे मिलन कैसा?


तेरी एक नजर पे उम्र ठहर गयी
बस जिंदगी ने साथ नहीं दिया।
गरल ही तरल हो तो सरल क्या?
मधुबन में तुमसे मिलन कैसा?

तपते रेगिस्तान में
तन को झुलसाती हवायें हैं
विचलित पथिक हो तो प्रयास क्या?
मधुबन में तुमसे मिलन कैसा?

जीवन अमृत की तलाश में आधर पे अमृत-कलश हो
छलक गरल जाए
यह जान मुख मोड़ लूँ तो प्यास क्या?
मधुबन में तुमसे मिलन कैसा?

परमीत सिंह धुरंधर

जमाले-मुख


जमाले-मुख का तेरे, तोड़ कुछ भी नहीं
उसपे से ये हाय, हया, बेजोड़ इनसे कुछ भी नहीं।

भटक रहे हैं सभी तेरे तिलिश्म में
रहे हैं जुदा – जुदा, पर मंजिल कुछ नहीं।

टूटे कितने तारे इस वफाये-मोहब्बत में
मगर इस रात की सहर कुछ भी नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

गुनाहों का समंदर


जो दफ्तर में मेरे ना हुए
वो बिस्तर पे मेरे हो गए
ये गुनाहों का कैसा समंदर है?
दोस्त, दुश्मन और दुश्मन, दोस्त हो गए.

परमीत सिंह धुरंधर

हाले-दिल


जो मेरे दिल के टुकड़े -टुकड़े
तेरे नयनों से हुए.
किन राहों में थाम के तुमको
बतलाऊँ हाले-दिल प्रिये।

परमीत सिंह धुरंधर

सहर तक का सफर


रातों का सफर था
उलझनों में सनम था
सहर तक आते – आते
उसने हर दावं बदल दिया।

परमीत सिंह धुरंधर