मैराडोना मैं, मेडोना तू


रूप-रंग में सोना तू,
अंग-अंग से टोना तू,
आज तो घूँघट खोल दे रानी,
मैराडोना मैं, मेडोना तू.
मैराडोना मैं, मेडोना तू.
मैराडोना मैं, मेडोना तू.
आज की रात लम्बी है,
तन-मन पे छाई मस्ती है.
बस अपने ओठों से पिला दे तू,
क्रिस्टिनो मैं, बिपाशा तू.
क्रिस्टिनो मैं, बिपाशा तू.
क्रिस्टिनो मैं, बिपाशा तू.

परमीत सिंह धुरंधर

This is dedicated to my favorite player Meradona and his love for the game.

प्रणय की रात


ग़मों की रातें, हैं छट रहीं.
कोई आ रहा हैं ख़्वाबों में.
दूर तक हैं रौशनी,
बिना चाँद के ही आसमानों में.
हवाएँ भी उठने लगीं,
न जाने क्यों साथ मेरे बहने को.
हर दर्द है मिट रहा,
बिना मेरे फरियादों के.
ग़मों की रातें, हैं छट रहीं.
कोई आ रहा हैं ख़्वाबों में.

परमीत सिंह धुरंधर

दुल्हन


भोर भइल बा बालम मोहब्बत में,
शाम होखे दीं तानी शरारत से.
रात होते -होते दिल भुला जाई,
का -का छुटल बा एकर मायका में.
डोली चढ़त त दिल कापत रहल की,
कैसे कटी जिन्दगी माई बिना ससुरा में.
अब त दिल ई कहता की काहे न तानी,
जल्दी आईनी रउरा ई अंचरा में।
प्यार जागल बा बालम,
तन-मन में जउन रउरा छुवन से.
तानी देखे दीं,
जी भर के दर्पण में.
रात होते -होते मन मचले लगी,
रउरे बाहों की दुनिया में.

परमीत सिंह धुरंधर

In these lines, I am trying to imagine what a girl is saying to her husband after her first night. What was her feeling when she left her parent’s house to join a new family.

रात


ये मत पूछ की वो कितने रात मेरे पास थीं,
ये पूछ की जब वो साथ थीं तो कैसी रात थी.
न खुद सोयी न मुझे सोने दिया,
सारी रात वो चुप थीं, और मैं भी खामोश था.
दिन – भर जो पहनती थी इठला -इठला कर,
रातों को मैंने, सोना-पीतल सब झाड़ लिया.
ये मत पूछ की मैंने कितने रात लूटें सोना-चांदी,
ये पूछ की मैंने क्या -क्या नहीं लुटा.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मुह-दिखाई


ऐसे नाहीं,
वैसे नाहीं,
ए राजा जी.
पाहिले कुछु त,
चढ़ाई हमपे,
ए राजा जी.
ए ने नाहीं,
वो ने नाहीं,
ए राजा जी.
पाहिले कुछु त,
दिखाई हमके,
ए राजा जी.
मत कुछ सिखाई,
ना बाताई,
ए राजा जी.
पाहिले रखीं,
एहिजा मुहवा-दिखाई,
ए राजा जी.

परमीत सिंह धुरंधर 

परमीत और मेनका


वो रात भर मेरी बाँहों में,
रक्त का संचार बनी,
मेरे हृदय कि धड़कने,
मेरी साँसों कि रफ़्तार बनी.
इन काली-काली रातो में,
मेरे जीवन का आधार बनी.
उड़-उड़ के उनकी जुल्फे,
गिरती  हैं  मेरे मुखड़े पे,
आँचल ढाल कर उनके काँधे से,
लिपटा है मेरे सीने से,
मासूमियत से दूर,
वो मेरी मुस्कान बनी.
इन काली-काली रातो में,
मेरे जीवन का आधार बनी.
अधखुली पलकों से,
वो देखती हैं मेरे तन को,
अभी भी दबी,
अपने सरमोहया के बोझ से.
उनके योवन कि खामोसी,
मेरी जवानी कि चीत्कार बनी.
पल में वो दूर जाती,
पल में पास आ रही,
अपनी जुल्फो कि उलझन से,
खुद उलझती जा रही.
उनकी ये विवसता,
मेरा राजपूती अहंकार बनी.
न रोसनी कि चाहत,
न उची उड़ान कि,
लगता हैं प्यारा अब ये अंधकार,
उनकी जुल्फे मेरी पाश बनी,
लो टूट रहा मेरा ब्रह्मचर्य परमीत,
वो मेनका-अवतार बनी.

प्रथम-मिलन II


ढल जाने दीजिये,
ढल जाने दीजिये,
आँचल को मेरे,
ढल जाने दीजिये।
कब तक मैं सम्भालूँ,
ये शर्मो-हया,
आज, अभी, इसे,
यहाँ टूट जाने दीजिये।
सीने में दबा के,
आँचल में छुपा के,
रखा है बरसों से,
जिसे राहों में बचा के,
आज, अभी, उसे,
यहाँ लूट जाने दीजिये।
ढल जाने दीजिये,
ढल जाने दीजिये,
आँचल को मेरे,
ढल जाने दीजिये।
कब तक मैं ही रहूँ,
बंध के रिवाजों से,
अरमानों को अपने,
यूँ दफना के,
जल रही है दिया,
जो कई रातों से,
आज, अभी, उसे,
यहाँ बुझ जाने दीजिये।
ढल जाने दीजिये,
ढल जाने दीजिये,
आँचल को मेरे,
ढल जाने दीजिये, परमीत।