मैं किसके साथ करूँ मनुहार बलम


ऐसे टूट गया है दर्पण,
अब कैसे करूँ श्रृंगार बलम?
तुम तो ले आये हो सौतन,
छाती पे कैसे करूँ मुस्ठ-प्रहार बालम।

अदायें मेरी फीकी पड़ी,
और रंग उतरा – उतरा सा.
तुम तो चुम रहे किसी और के वक्षों को,
मैं किसके साथ करूँ मनुहार बलम.

राते काटी नाही जाती सेज पे,
दीवारों को देख के.
तुम कसने लगे हो बाजूँओं में नई दुल्हन,
मैं किसपे रखूं अंगों का भार बलम?

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

सर्वोत्तम भार्या


नित संवर कर जो मन को लुभाती हो,
सीने से लग कर जो हर दर्द हर लेती हो.
भार्या वही सर्वोत्तम है जो हर स्थिति में,
अपने चौखट पे हर पल मुस्काती हो.

उषा का जो आँगन में स्वागत करे,
निशा को जो नयनों से चंचल करे.
भार्या वही सर्वोत्तम है जो हर स्थिति में,
जो सेज पे सखी सा सम्मोहित कर लेती हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरी बीबी बिहारन


मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।
मैं करूँ चूल्हा – चौकी,
वो ले धुप-सेवन।
मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।

मेरी कमर झुक रही,
उसका नित खिलता यौवन।
चार-चार बच्चे,
मैं सम्भालूं।
और चालीस में भी,
उसे मांगे रितिक रोशन।
मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।

मैं पढ़ा -लिखा हो कर भी,
अनपढ़ – गवार।
वो शुद्ध देशी,
मोह ले किसी का भी मन.
मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।

मैं मदिरा मांगू,
वो पिलाये मट्ठा।
मैं बोलूं मुर्ग-मसल्लम,
तो वो खिलाये लिट्टी-चोखा।
पर मेरी साँसों को,
वो लगती, हर दिन ए-वन.
मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।

मेरे वीरान जीवन की,
वो सुन्दर उपवन।
उसकी मुस्कान ही है,
मेरा तन-मन-धन.
मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

मेरी बीबी है बिहार की


मेरी बीबी है बिहार की,
बिस्तर पे भी रखती है,
घूँघट चार हाथ की.
चार – चार बच्चों की,
अम्मा बन गयी.
पर मैं देख ना पाया,
आज तक तिल उसके नाक की.
मेरी बीबी है बिहार की.

केश ही नहीं, जिस्म पे भी,
लगा लेती है रातों को, करुआ तेल.
चुम्बन की कोसिस में,
मैं फिसलता हूँ ऐसे,
जैसे बंद मुट्ठी में रेत.
कहती है, “आप मेरे भगवान् हो”.
और वो तुलसी मेरे आँगन की.
मेरी बीबी है बिहार की.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरी बीबी और मैं


झगड़े की शुरुआत,
रोटी से हुई.
मैंने कहा, “ये तो गोल नहीं है”.
उसने कहा, “खुश रहो, वरना ये भी तुम्हारी नसीब नहीं है”.
हद तो तब हो गयी,
करवा चौथ उसकी,
और उपवास मुझे रखना पड़ा.
बेगम पड़ी रहीं, दिन भर बिस्तर पे,
और मुझे खाली पेट,
उनके हाथों में मेहँदी,
और पावों में आलता लगाना पड़ा.

हर रिश्ता मेरा चुभता है उसकी आँखों में,
क्यों की, मैं उसकी माँ का बेटा नहीं बन पाया।
जवानी की सारी गलतफहमी मिट गयी,
सोचा था चार -चार शादी करूँगा,
मगर यहाँ एक से हिम्मत टूट गयी.
मुक्कम्मल जहाँ बसाने के लिए,
मैं दोस्तों के कहने पे घोड़ी चढ़ गया.
मुझे क्या पता था?
की कभी किसी को मुक्कम्मल जहाँ नहीं मिलता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

मेरी बीबी – देहाती


जब मेरी शादी होगी,
तो नाचेंगे बाराती।
मेरे शक्लो-सूरत पे,
तो कोई देख,
मेरी बीबी – देहाती।

मेरे आँखों पे होगा चश्मा,
और उसके मुख पे घूँघट लंबा।
उसको मिलेगा एक गवार,
और मुझको एक लाठी।

हंस – हंस कर, झूमेंगे,
झूम – झूम कर हँसेंगे,
वो अपनी ऊँची किस्मत पे,
और देख मेरी कामचलाऊं जोड़ी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

आलू – बैंगन – कांदा


दो – चार किलो दही,
दो – चार किलो आंटा।
आ बसा लें गृहस्ती,
तू लम्बी, मैं नाटा।
तुम्हे सैंडल भी दिलाऊंगा,
तुम्हे गहने भी पहनाउंगा।
लेकिन पहले सम्भालो आके,
मेरा चूल्हा – चौकी – चाका,
तू लम्बी, मैं नाटा।
दो – चार किलो दही,
दो – चार किलो आंटा।
आ बसा लें गृहस्ती,
तू लम्बी, मैं नाटा।
तेरे ओठों से लगा के,
हर रंग चखूँगा.
तेरी जुल्फों से बांध के हर,
खवाब रखूँगा।
लेकिन पहले सीख ले चलाना,
बेलन – छुरी -काँटा,
तू लम्बी, मैं नाटा।
दो – चार किलो दही,
दो – चार किलो आंटा।
आ बसा लें गृहस्ती,
तू लम्बी, मैं नाटा।
तुझे दिल्ली भी घुमाऊंगा,
तुझे पिक्चर भी दिखाऊंगा।
लेकिन पहले सीख ले बनाना,
आलू – बैंगन – कांदा,
तू लम्बी, मैं नाटा।
दो – चार किलो दही,
दो – चार किलो आंटा।
आ बसा लें गृहस्ती,
तू लम्बी, मैं नाटा।

 

परमीत सिंह धुरंधर