स्त्री


सत्य की पूजा नहीं होती,
धर्म की चर्चा नहीं होती।
वेदों को जरूरत नहीं,
जिन्दा रहने के लिए,
की मनुष्य उसे पढ़ें।
वेदों की उत्पत्ति,
मनुष्यों से नहीं होती।
तैमूर, चंगेज, क्या?
सिकंदर भी थक गया था,
यहाँ आके.
ये हिन्द है,
यहाँ तलवारो के बल पे,
तकदीरें सुशोभित नहीं होती।
वो जितना भी सज ले,
तन पे आभूषण लाद के.
मगर, यहाँ, बिना शिशु को,
स्तनपान कराये,
नारी कभी पूजित नहीं होती।
घमंड किसे नहीं,
यहाँ सृष्टि में.
बिना अहंकार के,
सृष्टि भी शाषित नहीं होती।
तीक्ष्ण बहुत है तीर मेरे,
मगर बिना तीक्ष्ण तीरों के,
शत्रु कभी पराजित नहीं होती।
मुझे संतोष है,
की वो वेवफा निकली।
क्यों की बिना बेवाफ़ाई के,
कोई स्त्री कभी परिभाषित नहीं होती।

 

परमीत सिंह धुरंधर

रातों में नेहरू बनना चाहते हैं


ज़माने को गुनाह करने दो,
हम इश्क़ करेंगे।
वो शांत हैं, शातिर हैं,
बच के निकल लेंगे।
सिरफिरों में मेरा नाम
चलने दो।

भगत सिंह की इस धरती पर
सब लंबा जीना चाहते हैं।
रातों में नेहरू
और दिन में गाँधी
बनना चाहते हैं।
वो चालक हैं, चतुर हैं,
सत्ता हथिया लेंगे।

मुझे संघर्ष की राहों का
राम मनोहर लोहिया बनने दो।
भीड़ के इस अंधे मेले में
थोड़ा अलग तो मुझे रहने दो।
जो सच कहें,
उन्हें पागल ही रहने दो।

लड़कियों का क्या है?
वो इन्हीं से प्रेम करेंगी,
कुँवारी इन्हीं के बच्चों की माँ बनेंगी,
और फिर इन्हीं के आँगन में रोएँगी।
जो सच्चे होंगे,
वो ठुकरा दिए जाएँगे,
जो शातिर होंगे,
वो गले लगाए जाएँगे।

वो कमजोर नहीं, पारंगत हैं
इस शोषण के खेल में।
उन्हें ये खेल खेलने दो।
सत्ता के खिलाफ बिगुल
बजाने वालों में मेरा नाम रहने दो।

ज़माने को गुनाह करने दो,
हम इश्क़ करेंगे।
वो शांत हैं, शातिर हैं,
बच के निकल लेंगे।
सिरफिरों में मेरा नाम
चलने दो।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

यह कविता समाज की नैतिक विडंबनाओं, राजनीतिक पाखंड, प्रेम में छल, और सच्चाई के संघर्ष को व्यक्त करती है। कवि स्वयं को उस भीड़ से अलगमानता है जो सत्ता, स्वार्थ और दिखावे के पीछे भागती है।

कविता में Bhagat Singh, Jawaharlal Nehru, Mahatma Gandhi और Ram Manohar Lohia जैसे व्यक्तित्वों के माध्यम से आदर्शवादऔर अवसरवाद के बीच का विरोध दिखाया गया है। कवि उस व्यवस्था पर प्रश्न उठाता है जहाँ चालाक और शातिर लोग सफल हो जाते हैं, जबकि सच्चे और संवेदनशील लोग ठुकरा दिए जाते हैं।

“हम इश्क़ करेंगे” पंक्ति केवल प्रेम का प्रतीक नहीं, बल्कि विद्रोह, सत्य और मानवीय संवेदना को बचाए रखने का संकल्प है। पूरी कविता संघर्ष, अस्वीकार, और व्यवस्था-विरोधी चेतना का स्वर प्रस्तुत करती है।

This poem expresses rebellion against social hypocrisy, political opportunism, emotional manipulation, and the rejection of sincerity in modern society. The poet sees himself as different from the crowd that blindly chases power, image, and self-interest.

Through references to Bhagat Singh, Jawaharlal Nehru, Mahatma Gandhi, and Ram Manohar Lohia, the poem contrasts revolutionary ideals with the hypocrisy of contemporary society. It criticizes a world where cunning and manipulative people gain power and admiration, while honest and emotionally genuine individuals are ignored or rejected.

The recurring line, “We will continue to love,” is not merely about romance; it symbolizes resistance, humanity, and the refusal to surrender one’s truth despite corruption and betrayal. Overall, the poem represents a voice of struggle, alienation, and defiance against both social and political systems.

गुनाहों की चादर


दुनिया की भीड़ में,
मैं खो गया.
ऐसा आप सोचते हो,
ये हकीकत नहीं हैं दोस्तों।
हकीकत तो ये है की,
गुनाहों की चादर,
इतनी लंबी है उनकी,
की मैं आसानी से छुप गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

औरत – मर्द


वो जो कल तक,
मेरी किस्मत बदलना चाहती थी,
अब अपना घर बदल रही हैं.
मर्द बस बदनाम हैं इस बाजार में,
गली – गली में औरत अपना बिस्तर,
बदल रही है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अहिंसा परमो धर्म:


जब सारी दुनिया गाती है,
अहिंसा परमो धर्म:.
मैं तिब्बत – तिब्बत गाता हूँ,
अकेला रह जाता हूँ
भीड़ छट जाती है, धीरे – धीरे,
मैं अकेला ही गाता हूँ.
कम्युनिष्टय JNU के,
सारे मौन हो जाते हैं.
मूक – बधिर बन के, फिर वो
गांधी के बन्दर से बन जाते हैं.
जब कम्युनिष्टय JNU के चिल्लाते हैं,
फासीबाद से डरना नहीं।
तब मैं चंद्रशेखर -चंद्रशेखर चिल्लाता हूँ,
अकेला रह जाता हूँ.
आइसा-SFI सब भाग जाते हैं,
मैं अकेला ही चिल्लाता हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

October 2


जब पूरी दुनिया October 2 को गांधी जयंती के रूप में मनाती हैं, तो मैं सिर्फ जय जवान- जय किसान कहता हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ना चरण – स्पर्श करों


ना प्रेम करों,
ना उपहास करों।
नारी तो देवी है,
पर,
ना चरण – स्पर्श करों।
ये तो माँ का सम्मान है,
ना माँ का नारी से तुलना करों।
माँ तो शक्ति हैं, माँ तो सत्य हैं,
माँ साक्षात् ब्रह्म है,
बस माँ का ही बंदन करों।

 

परमीत सिंह धुरंधर

जंग तो लड़ना होगा


जीत के लिए,
जंग तो लड़ना होगा।
सत्ता पाने के लिए,
सत्ताधीशों को उखाड़ना होगा।
न्याय की उम्मीद नहीं कर सकते,
यूँ सर झुका कर अब इनसे।
न्याय चाहिए तो,
आँखे मिलाकर,
न्यायधीशों को ललकारना होगा।
जिन्हें प्यार से आहार चाहिए,
वो बैठ जाएँ अपने घर और गोशालों में.
सबेरा देखने वालों को,
इन अंधेरों से गुजरना होगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

She is Krity Olina


There is no way,
That you ignore her.
There is no way,
That you suppress her.
She is the naughty, sweet,
And the most beautiful girl.
She does not know,
How to swim.
But she knows how to dream.
She is not clever,
But she knows hot to defeat them.
There is no way,
That you distract her.
There is no way,
That you stress her.
She is smart, sweet
And the most beautiful girl.

 

Parmit Singh Dhurandhar

I love your stupidity


Kiss me,
Kiss me,
Without saying.
Pull me,
Without telling.
I love your surprise,
In the crowd,
In the middle of the road.
Hug me,
Hug me,
Without thinking.
Hold me,
Without hinting.
I love your stupidity,
In the kitchen,
At the shore.

 

Parmit Singh Dhurandhar