जंगे-जीत हासिल करेंगें


घरौंदें,
मिटटी के.
बनते ही हैं,
टूटने के लिए।
मगर इन्हे,
घर बंनाने के लिए।
आखिरी साँसों तक,
हम लड़ेंगे।
वो निकलें हैं,
बैठ के हाथी पे।
अपने मद में,
मतवाले।
हम नंगे पाँव ही,
ज़मीन पे खड़े होकर,
उनका सामना करेंगे।
कहता रहे जमाना,
हमें नादान,
नासमझ, नालायक।
हम अपनी,
अनुभवहीनता के बावजूद।
ये जंगे-जीत,
हासिल करेंगें।

परमीत सिंह धुरंधर

मेरा संघर्ष भी जारी है


प्रयास है जमाने का,
हमको मिटाने की.
मेरा संघर्ष भी जारी है,
हर गम में मुस्कराने की.
अकेला ही खड़ा हूँ,
एक दिन तो गिरना है.
पर अपनी भी चेष्टा हैं,
सबको झुठलाने की.
बादलों ने मुख मोड़ा है,
हवाओं ने रुख बदला है.
सब विरुद्ध में हैं खड़े,
पर माँ संग में है लेके,
दुवाओं की झोली।
प्रयास हैं लहरों का,
हमको उखारने की.
मेरा संघर्ष भी जारी है,
अपने हर निशाँ को बचाने की.
प्रयास है जमाने का,
हमको मिटाने की.
मेरा संघर्ष भी जारी है,
हर गम में मुस्कराने की.

परमीत सिंह धुरंधर

आज़ाद साँसें


ग़मों से सजी जिंदगी,
खुशहाल हैं.
अगर ये साँसें,
मेरी आज़ाद हैं.
क्या होगा,
वैसी ख़ुशी का.
जिसमे आँखे झुकीं,
और तन पे,
सोना-चांदी का,
चमकता लिबास है.
भूख से बिलखती रातें,
खुशहाल हैं.
अगर हर सुबहा पे,
मेरा इख्तियार है.
क्या होगा उन ख़्वाबों को,
देखकर,
जिसपे किसी के हुक़्म का,
पाबन्द है.
ग़मों से सजी जिंदगी,
खुशहाल हैं.
अगर ये साँसें,
मेरी आज़ाद हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

कलम और भय


कलम उठा ली है,
तो भय क्या फिर तलवार का.
जब आ गए हैं सागर की लहरों में,
तो फिर सहारा क्या पटवार का.
चाँद साँसों के लिए,
नहीं झुकने देंगे ये अपना तिरंगा।
जब मौत ही निश्चित है,
तो फिर भय क्या क़यामत का.

परमीत सिंह धुरंधर

एक दीप तो जले कहीं


हौसलें टूटते रहें,
पर लड़ाइयां लड़ी जाएंगी।
दुःख ही मिलेगा मगर,
चढ़ाइयां तो की जायेंगीं।
कोई साथ आता हैं तो आये,
या फिर साथ ना आये.
अपने साँसों के बल पे ही,
उचाईंयां नापी जाएंगी।
एक दीप तो जले कहीं,
फिर दीपमाला बनाऊंगा मैं।
रणभूमि तो सजें कहीं,
फिर रौंद के जाऊँगा मैं।
स्वतः के बलिदान से ही सही,
मगर ये बेड़ियां तोड़ी जाएंगी।
हौसलें टूटते रहें,
पर लड़ाइयां लड़ी जाएंगी।

परमीत सिंह धुरंधर

मज़ा


रौशनी में दिवाली तो हर कोई मनाता हैं,
अंधेरों में दिया जलाना हमें आता है.
अपनी किस्मत पे गुमान करने वालो,
किस्मत के साथ जुआ खेलने का मज़ा हमें आता हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

मैं बहता चला


जिंदगी की मस्ती में मैं बहता चला,
मुझे कोई क्या रोक सकेगा भला.
मैं गिरता रहा, गिर कर उठता रहा.
मुझे कोई क्या रोक सकेगा भला.
लाखों राहें हैं मेरे लिए यहाँ बनीं,
पर मैं इन राहों का मुसाफिर नहीं.
उठ जातें हैं मेरे कदम खुद-ब-खुद उस तरफ,
जिस तरफ अंधेरों ने रखी है अपनी पालकी.
फूल कोई मेरी किस्मत में नहीं, ये जानता हूँ,
इसलिए बहारों से कोई रिश्ता, मैं रखता नहीं.
काँटों से उलझता हूँ मैं मुस्करा-मुस्करा कर,
की नशों में मेरे लहूँ की कमी नहीं.
ज़माने को ये नहीं हैं अंदाजा,
की ठोकरों में उसके हर हस्ती को, मैं तौलता चला.
जिंदगी की मस्ती में मैं बहता चला,
मुझे कोई क्या रोक सकेगा भला.
मैं गिरता रहा, गिर कर उठता रहा.
मुझे कोई क्या रोक सकेगा भला.

परमीत सिंह धुरंधर