पुत्र का गर्व


सिंह सा गर्जना करता हुआ,
जब तू चलता है धरती पे.
गर्व होता है मुझको ए पिता,
पुत्र तुम्हारा कहलाने में.

परमीत सिंह धुरंधर

बाबा जागार्जुन की याद में


आवो महारानी हम उठाएंगे पालकी (बाबा जागार्जुन की पंक्ति),
ये ही आज्ञा हुई है जवाहर लाल की ((बाबा जागार्जुन की पंक्ति).
जिस तन पे तुमने चाबुक बरसाई थी,
जिन साँसों को दी, अँधेरी कोठरी।
उसी तन पे, चन्दन लगा के,
उन्ही साँसों से उतारेंगे तेरी आरती।
आवो महारानी हम उठाएंगे पालकी,
ये ही आज्ञा हुई है जवाहर लाल की.
तेरे गोर तन के आगे,
कहाँ काली हमारी काया।
कागज़ में स्वतंत्र हैं,
पर मन पे तेरी ही छाया।
तेरे चरणों को पखारेगी,
स्वयं भगत सिंह की माँ.
और शहीदों की बेवाएं,
लगाएंगी तेरे जयकार की बोली।
आवो महारानी हम उठाएंगे पालकी,
ये ही आज्ञा हुई है जवाहर लाल की.

परमीत सिंह धुरंधर

प्रयास कर


प्रयास कर, ए मानव,
प्रयास कर.
विपरीत है परिस्थिति,
तो कुछ खास कर.
प्रयास कर, ए मानव,
प्रयास कर.
तू तरल नहीं,
जो ऊंचाई से फिसले.
तू सरल नहीं,
जो उनके अंगो पे बहके.
मिला है तुझे योवन,
तो चट्टानों पे प्रहार कर.
प्रयास कर, ए मानव,
प्रयास कर.
माना, तेरी किस्मत में,
सुबहा नहीं,
माना, अंधकारों में,
कोई तेरे पास नहीं.
माना, ठोकरों ने तौला है तुझे,
माना, नहीं बची हैं तेरी साँसे.
पर आखिरी क्षणों तक,
बनके धुरंधर, हुंकार भर.
प्रयास कर, ए मानव,
प्रयास कर.
रणभूमि सजी है,
तो क्या तेरा अपना-पराया.
हर तीर मिटा सकता है,
तेरा अपना साया।
तो हर बढ़ते कदम पे अपने,
खुद ही जय-जय कार कर.
प्रयास कर, ए मानव,
प्रयास कर.

परमीत सिंह धुरंधर

शिवा जी


छोटे कद के,
वीर बड़े थे, शिवा जी.
मुगलो को,
दौड़ा-दौड़ा के,
पीटते थे, शिवा जी.
छोटे कद के,
वीर बड़े थे, शिवा जी.
औरंगजेब की नींदे उड़ा दी,
और अफजल खान की साँसे.
हिन्दुस्तान के स्वाभिमान की,
नीवं बने थे, शिवा जी.
छोटे कद के,
वीर बड़े थे, शिवा जी.
माँ के सपने,
गुरु के अलख पे,
अडिग खड़े थे, शिवा जी.
छोटे कद के,
वीर बड़े थे, शिवा जी.

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी


जिंदगी है मेरी, गुजर ही जायेगी, गम न करो,
बस, तुम्हारी आँखों में ये काजल कभी काम न हो.

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी


अपने दर्द को समेटे, बैठा है समंदर,
आंसुओं को सैलाब बना के.
कोई क्या समझेगा जिंदगी,
जो जीता है गमो को बिना मुस्करा के.

परमीत सिंह धुरंधर

चार-सहेलिया


राते आइलन हमर बलमुआ, चाँद पे तेल लगा के,
अंग-अंग हिला गइलन, हमके भांग पिला के.
राते आइलन हमर बलमुआ, अंखिया के ऐनक तुड़ा के,
भौजी के झूला गइलन, मुखड़ा हमार बता के.
राते आइलन हमर बलमुआ, दारु पे दारु चढ़ा के,
सारा माल लूट लेहलन, पड़ोसी के रसोई में जाके.
राते आइलन हमर बलमुआ, मुह में पान चबा के,
सउँसे देहिया लाल कइलन, हमके गुलाब बता के.

परमीत सिंह धुरंधर

मेवाड़ की गोरी


तेरी ऐसी नजरिया है काली, हम भी दीवाने हो गए.
तूने ऐसी नजरिया है डाली, राणा भी मस्ती में बहक गए.
सोने सा योवन तू लेके, चलती है जो पनघट पे,
भींगे-भींगे तेरे तन से, सुलगता है सबका तन-मन रे.
तूने ऐसी पहनी रे चोली, हम भी दीवाने हो गए.
तूने ऐसी सिलाई रे चोली, राणा भी मस्ती में आ गए.
झुकी-झुकी नजरो से जो तू देखे एक बार,
मेवाड़ में बहने लगती है, मस्त-वयार।
तूने ऐसी है पेंच लड़ाई, हम भी दीवाने हो गए.
तूने ऐसी है ढील बढ़ाई, राणा भी मस्ती में बहक गए.
खिला-खिला तेरा अंग, छेड़े मन में मेरे मृदंग,
जो भी देखे तुझे, चाहे तेरा ही संग.
तूने ऐसी है आँचल उड़ाई, हम भी दीवाने हो गए.
तूने ऐसी है ली अंगराई, राणा भी मस्ती में आ गए.

परमीत सिंह धुरंधर

चुम्बन


मेरे सीने पे, उनकी अधरों का चुम्बन,
अब कोई तीर भी चलाये, तो क्या गम है.
एक बार तैर गए ये दरिया,
अब डूब भी जाएँ, तो क्या गम है.
मौत तो आएगी, अगर जिंदगी है,
मौत ही अगर जिंदगी हो, तो क्या गम है.

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


तेरी बाहों में सरकते-सरकते,
सुबह से शाम हो गयी.
अब भूख लगी है मुझे,
माँ की फिर याद आ गयी.
तेरे तन की खुसबू ,
भी अब मीठी नहीं लगती।
वो लड्डू मेरी माँ के हाथों की,
फिर से मुझे याद आ गयी.

परमीत सिंह धुरंधर