छपरहिया


हम छपरहिया
जैसे घूमे हैं पहिया
अरे, दुनिया घुमा दें.

अरे तीखें नैनों वाली
चोली की लाली
अरे हम चाहें तो
आँखों का सुरमा चुरा लें.

यूँ तो भोले -भाले
हैं हम सीधे -सादे
आ जाएँ खुद पे
तो बिजली गिरा दें.

Rifle Singh Dhurandhar

अपने बेगम की चोली का रंग लाल हूँ


बेलगाम, बेधड़क, बेदाग़, बेबाक हूँ
हर खेल का माहिर धुरंधर
छपरा का मस्तान हूँ
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.

रंगों से बना नहीं
मगर हर एक रंग में शामिल हूँ
कुवारियों के आँखों का ख्वाब
विवाहितों के दिल की कसक
मैं अपने बेगम की चोली का रंग लाल हूँ।
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.

नागार्जुन का विद्रोह
दिनकर की आवाज हूँ
बुद्ध, महावीर का तप – त्याग
गुरु गोविन्द सिंह जी और चाणक्य
का शंखनाद हूँ.
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.

पनघट पे गोरी की मुस्कान
मस्ती में बहता किसान हूँ
पुरबिया तान, खेत -खलिहान
फगुआ में भाभियों की सताता
निर्लज -बदमाश हूँ.
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर 

पिया निर्मोहिया


पिया निर्मोहिया ना समझे ला दिल के
कैसे समझाईं सखी अपना ई दिल के?
दिन भर बैठकी मारेला छपरा में
दहकत बा देहिया हमार सेजिया पे.

परमीत सिंह धुरंधर 

छपरा के जलेबी-2


अरे झूठे कहेला लोग इनके निर्मोही
पिया बारन धुरंधर इह खेल के.
बिना उठईले घूँघट हमार
अंग -अंग चुम लेहलन अपना बात से.

परमीत सिंह धुरंधर 

छपरा का धुरंधर


मेरे आसमा पे जितने भी सितारे हैं
सभी कह रहे की वो बिहारी हैं.
यूँ ही नहीं बना मैं छपरा का धुरंधर
मुझे बनाने वाले ये ही वो शिकारी हैं.

परमीत सिंह धुरंधर 

छपरा की बैठकी


मुझे छोड़ गए बलमा
एक प्यास जगाकर।
सुलगती रही सारी रात
मैं एक आस लगाकर।

काजल भी न बहा
न टुटा ही गजरा।
उड़ गया वो भौंरा
अपनी जात बताकर।

कोई संदेसा पीठा दो
उस हरजाई Crassa को.
न ऐसे छले
हाय, दिल लगाकर।

जाने क्या मिलता है
छपरा की बैठकी में.
की भूल गए तुम हमें
अपनी लुगाई बनाकर।

परमीत सिंह धुरंधर

फंस गया छपरा का धुरंधर


मेरे नैनों के बस दो तीर चले थे
और लोट गया चरणों में वो सिकंदर।

सुना था बड़ा वीर है Crassa
समझता है जो खुद को कलंदर।

बस चोली के दो बटन ही खोले थे
और फंस गया वो छपरा का धुरंधर।

परमीत सिंह धुरंधर

छपरा के धुरंधर


ऐसी चढ़ी जवानी सखी,
की हाहाकार मचा दूंगी।
पतली कमर के लचक पे अपनी
सखी, चीत्कार मचा दूंगी।
तरस रहे हैं,
आरा – बलिया के बाबूसाहेब
मैं तो छपरा के धुरंधर
संग खाट बिछा लूंगीं।
मैं तो छपरा के धुरंधर संग
विवाह रचा लूंगीं।

आह उठने लगी है
मेरी गदराई जवानी पे.
खेत और खलिहान सब सखी,
अपनी चोली से सुलगा दूंगी।
तरप रहे हैं,
गोरखपुर – धनबाद के बाबूसाहेब
मैं तो छपरा के धुरंधर से
चोली सिला लूंगीं।
मैं तो छपरा के धुरंधर संग
विवाह रचा लूंगीं।

परमीत सिंह धुरंधर