पनघट पे जो प्रेम मिला, वो कहाँ है इन मयखानों में?
सारा मेरा सागर सोंख गयी वो रात की पायजेबों में.
वो घूँघट से झाँकती, मुस्काती आँचल के ओट से
वो लचक कमर की अब कहाँ इन मदिरालय की अप्सराओं में.
परमीत सिंह धुरंधर
पनघट पे जो प्रेम मिला, वो कहाँ है इन मयखानों में?
सारा मेरा सागर सोंख गयी वो रात की पायजेबों में.
वो घूँघट से झाँकती, मुस्काती आँचल के ओट से
वो लचक कमर की अब कहाँ इन मदिरालय की अप्सराओं में.
परमीत सिंह धुरंधर
मेरे ह्रदय की गति को बढ़ाकर
वो तरुणी अपनी संचित मुस्कान बिखेरकर
बोली, “हे पथिक, किस पथ के गामी हो?”
किस ग्राम के वासी हो?
हे प्यासे, थोड़ा अपनी प्यास बुझा लो
ये वन नहीं, यहाँ तुम्हे भय नहीं
सो मृग सा अपनी पलकों को थोड़ा झपका लो.
तुम्हारे गोरे मुख को
ग्रास रहा है सूर्य अपने तप से.
और थकान मदिरा घोल रहा है
तुम्हारे नस- नस में.
अविवाहित हो क्या?
जो इतना उतावलापन है.
गठरी को धरा पे रख
इस वटवृक्ष के तले थोड़ा सुस्ता लो.
कहो तो घर से रोटी – मीठा ला दूँ
हलक के साथ – साथ, उदर की
जठराग्नि को भी मिटा लो.
परमीत सिंह धुरंधर
ए मौसम देख ज़रा
क्यों मेरा रंग है खिला – खिला?
ऐसी चढ़ी जवानी मुझपे
रखती हूँ मैं चोली का बटन खुला – खुला।
कितने भौरें तड़प रहें?
कितने भौरें हैं तरस रहें?
ए मौसम देख ज़रा
मेरे वक्षों पे है बसंत नया – नया.
परमीत सिंह धुरंधर
मेरा कौवा काला – काला
ढूंढे कोई मधुशाला
जहाँ मदिरा हाँ पिलाये
कोई कमसिन सी एक बाला।
दो नयना हो तीखे – तीखे
और वक्षों के मध्या
चमके कोई छोटा
सा तिल एक काला।
फिर पंख फैला के
उड़ जाए आसमा में
चोंच के मध्या दबा के
चोली का कोई धागा।
तुमने ऐसा प्यासा छोड़ा
नासूर बन गया फोड़ा
अब तो ये प्यास मिटती नहीं
चाहे जितना भी पिलाती मेडोना।
तेरी आँखों का जादू
लूट ले गया मेरा पूरा काबुल
पतली कमर तूने हिला के
ऐसे मारा दिल पे हथोड़ा।
सब कहते हैं मैं हूँ पागल
तूने ऐसे छनकाया अपना छागल
डोली चढ़ गयी किसी और के
मुझको खिला के गरम पकोड़ा।
सत्ता में हैं मोदी
यूपी को संभाले योगी
मुझको तूने ऐसे नचाया
जनता को नचाये जैसे
केजरी – ममता – और माया।
कौवा बोलै इश्क़ में
तुझे प्यार करूँगा लेके risk मैं.
काला हूँ पर हूँ बिहारी मैं
गोता लगाता हूँ बड़ा तीव्र मैं.
परमीत सिंह धुरंधर
राजा, आँखों में तेरे प्यास बहुत है
डरता है दिल, शर्म उतारूं कैसे?
तू लगता है शातिर, चालक बहुत है
घूँघट मैं अपना उठाऊं कैसे?
राजा, तू है एक निर्दयी, तुझमे अहंकार बहुत है
अपने वक्षों से आँचल सरकाऊ कैसे?
तेरे नजर है बस जिस्म पे, जिसे पाना आसान बहुत है
ऐसे हरजाई संग घर बसाऊं कैसे?
परमीत सिंह धुरंधर
सैया मेरा काला – काला, काला – काला सा
चौसठ की उम्र में ढूंढे सोलह की बाला।
ढल गयी मेरी जवानी, चुल्लेह पे बैठे – बैठे
वो खाट पे बैठे – बैठे ढूंढे रोज मुर्ग – मशाला।
परमीत सिंह धुरंधर
जिंदगी के गम को कुछ यूँ भुलाता हूँ
अपनी सफ़ेद दाढ़ी पे उन के हुश्न का रंग लगाता हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
तन्हाइयों में शहनाइयाँ बजने लगे
मोहब्बत ऐसे मुकाम पे आ गयी है.
मैं मोदी सा खामोश हो गया
और वो ममता सी गठबंधन में आ गयी है.
परमीत सिंह धुरंधर