समंदर भी कहाँ शांत है हवाओं का जोर से?
तन्हा – तन्हा सा मैं तन्हाइयों का शोर में.
जो समझते हैं मसीहा खुद को इस दौर है
उन्हें क्या पता, कब क्या हो जाए, किसी मोड़ पे?
परमीत सिंह धुरंधर
समंदर भी कहाँ शांत है हवाओं का जोर से?
तन्हा – तन्हा सा मैं तन्हाइयों का शोर में.
जो समझते हैं मसीहा खुद को इस दौर है
उन्हें क्या पता, कब क्या हो जाए, किसी मोड़ पे?
परमीत सिंह धुरंधर
जिसको भी आता है घोंषला बनाना
इस शहर में उसी का घोंषला नहीं है.
कैसे सवारोगे किस्मत को Crassa?
किस्मत में बस यही एक चीज़ लिखी नहीं है.
उड़ रहे हैं बहुत परिंदे आसमा में
मगर दूर – दूर तक इनका कोई आशियाना नहीं है.
संभालना सिख लो गलियों में ही
ये शहर देता दोबारा मौका नहीं है.
उजड़ा है मेरा गुलिस्ता यहीं पे कभी
मगर शहर ये अब भी शर्मिन्दा नहीं है.
परमीत सिंह धुरंधर
ए समंदर मेरे, मेरा शौक रख
माना की अकेला हूँ अभी
पर फिर भी तू मेरा खौफ रख.
तेरे तट पे अभी भिक्षुक हूँ मैं
पर दसरथ-पुत्र हूँ मैं
उसका तो तू मान रख.
गुजरा है मेरा भी कारवां
जय – जयकारों के उद्घोष से.
अगर तू अनजान है तो
बेसक यूँ ही मौन रख.
मगर मेरी तीरों को अब भी
आशीष प्राप्त है महादेव का.
अतः निष्कंटक छोड़ दे मेरी राहें
अन्यथा रघुवंश से युद्ध का गर्व प्राप्त कर.
परमीत सिंह धुरंधर
कौन हमारी नींदों में विरहा के ये धुन बजाता?
कौन है जो मेरे रक्त का, यूँ निरंतर ताप बढ़ाता?
कौन है जो मिलन के ये आस जगा के छुप रहा?
कौन है जो मुझको जगा के यूँ, स्वयं सो रहा?
कौन है जो नैनों के बाण से ह्रदय मेरा बेंध रहा?
कौन है जो मेहँदी की लाली से ख़्वाबों को सींच रहा?
कौन है जो मुझको बेशर्म बना के स्वयं शर्म में बांध रहा?
कौन है जो प्रेम पग बढ़ा के मुझको यूँ छल रहा?
परमीत सिंह धुरंधर
जो अनंत, असीमित हो
जो निरंतर प्रवाहित हो.
जो दुःख में, सुख में
अकल्पनीय, अकल्पित हो.
जो मधुर से मधुरतम
प्रेम में प्रीत हो.
जो जड़ से जड़ित,
प्रेम से पीड़ित हो.
जो प्रेयसी के बाहों में भी
विरह से ग्रसित हो.
जो प्रेम के मिलन को
निरंतर अंकुरित हो.
जिसके नाम पे दुनिया
भय से कम्पित हो.
जो उषा में, निशा में,
हर एक दिशा में,
सूर्य सा अबिलम्ब उदित हो.
परमीत सिंह धुरंधर
मैंने प्यार में क्या – क्या गवाया?
इसकी कोई गिनती नहीं।
सब मेरे अंदर है,
मेरे बाहर कुछ भी नहीं।
समेट लूँ, समेट लूँ, समेट लूँ
दुनिया की हर ख़ुशी
हर कोई यही चाहता है आज.
मेरी ख़ुशी क्या है?
मैंने आज तक समझा ही नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
हर किसी की मोहब्बत में ख्वाइशें नहीं होती
बिस्तर तो होती है पर सिलवटे नहीं होती।
क्या संभाले कोई जिंदगी को ?
सँभालने से जिंदगी की पूरी जरूरतें नहीं होती।
शिकायतें बढ़ती जा रही हैं उसकी
हर रात जिंदगी के साथ.
अब चाँद कहने और चुम्बनों से
दूर उनकी शिकायतें नहीं होती।
परमीत सिंह धुरंधर
कातिल बड़ी है नजर ये तेरी
प्यासे हैं सब देख जवानी तेरी।
कभी किताबों में कुछ तो हाँ लिख दे
अगर पढ़ नहीं सकती चिठ्ठी मेरी।
परमीत सिंह धुरंधर
जो हमें हमारी आरजू दे गए
कसम से बड़े बेआबरू कर गए.
परमीत सिंह धुरंधर
सब चाहते हैं जानना की खुदा कहाँ है?
जन्नत कहाँ है?
माँ जिधर कदम रख दे
उससे हसीन भला और क्या है?
परमीत सिंह धुरंधर