वफाओं पे रोती हैं


हमसे क्या पूछते हो?
किनारों पे घर कैसे बनायें?
कई शहर डूबे हैं,
इन किनारों पे बसकर।
शौक किसे नहीं,
की सागर की लहरों पे खेले।
मगर कस्तियाँ नहीं उतारते इनमे,
दिल में जुल्फों का ख्वाब रखकर।
खुदा भी उसका नहीं,
जो इश्क़ में, हुस्न पे, आँख मूंद ले.
वफाओं पे रोती हैं ये, बेवफाओं के आँगन में,
अपने वफादारों को मिटा कर.

 

परमीत सिंह धुरंधर

दरख्तों में सुराख कर गए हो


दिल-शहर में, हमसे पूछो तुम,
कितनों के मकानों में, तुम बस गए हो.
झुकी – झुकी निगाहों से अपने,
पुराने -नए, सब दरख्तों में सुराख कर गए हो.
परिंदे जिन्हें पसंद हैं, आसमा की उड़ान,
उन्हें भी जमीन पे चमन दिखा गए हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


मैंने इश्क़ किया उस दरिया से,
जिसकी धारा के कई किनारे हैं.
मैं क्या बाँधूँ उसकी लहरों को,
जो बस खारे – सागर के ही प्यासे हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शहर


बहुत कम होते हैं,
जिन्हें अपने शहर में,
मिलता है मौक़ा -इश्क़ का.
आपने वहां शिविर डाला है,
जो शहर ही है, मेरे इश्क़ का.

 

परमीत सिंह धुरंधर