पुत्र मेरे, तुम नीलकंठ बनो


मैंने देखें हैं दिल के कई टुकड़े,
भिखरे हुए तेरे आँगन में.
रोते हो क्या तुम आज भी,
बैठ के मेरे यादों में.
बढे चलो, मुझे भूलकर,
ये प्रेम नहीं,
ये बेड़ियाँ हैं, तुम्हे रोकेंगी।
पुत्र मेरे, सबल बनो,
इस निर्बलता के केंचुल से.
जीवन में जो भी विष मिले,
ऐसे उसे धारण करों,
की अजर – अमर नीलकंठ बनो.
नागिन है ये दुनिया, बस बिष ही देगी,
उसपे नारी,
शल्य सा तुम्हारा मनोबल हरेगी।
पुत्र मेरे, तुम अपने हाथों से,
कुरुक्षेत्र में भविष्य गढों।
ना की भविष्य का चिंतन,
नारी के आगोस में बैठ के करो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जीवन हो तो शिव सा


जीवन हो तो शिव सा,
सर्वश दान कर दूँ.
मैं चखुं बस विष को,
जग को अमृत-पान दूँ.
अवघड कहे जग मुझे,
या भभूत-धारी।
या फिर योगी बन के,
मैं भटकता रहूँ।
पर भगीरथ के एक पुकार पे,
मैं प्रलय को बाँध दूँ.
जीवन हो तो शिव सा,
सर्वश दान कर दूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

दुखिया


तानी सुनी न दिलवा के बतिया,
कोरा-कोरा मन बा, कोरा रे रतिया।
ए भोला तानी सुनी ना,
का कह अ तारी दुखिया।
गावें-गावें खेलनी,
सावन के झूला भी,
सब सखियाँ के गोद भरल,
बस रह गैनी हम ही,
कोरा-कोरा हमर आचार, कोरा रे देहिया।
तानी सुनी न दिलवा के बतिया,
कोरा-कोरा मन बा, कोर रे रतिया।
ए भोला तानी सुनी ना,
का कह अ तारी दुखिया।

शिव


तुम शिव हो, तुम शंकर हो,
इस जगत के तुम सवामी निरंतर हो।
मैं अज्ञानी पापी प्रभु,
ज्ञान के तुम सागर-समुन्दर हो.
तुम कालजयी, कालनायक,
विश्व के तुम संहारक हो.
मैं तुच्छं-सुक्ष्म,विरह-वाशना से बंधा,
निर्गुण के तुम धुरंधर हो.