एक MMS के कारण मोना सिंह को उनके प्रेमी ने छोड़ दिया. लेकिन, एक आम आदमी ने शर्लिन चोपडा को अपना जीवन संगनी बनाना स्वीकार किया. आमिर खान ने अपनी बचपन की दोस्त, दो बच्चॊ की माँ, को छोड़ कर किरण राव को थाम लिया. वहीँ एक आम इंसान से स्टार बने शाहरुख़ खान आज भी गौरी के हमराज हैं. जहाँ सलमान खान रोज नयी प्रेमिका तलाशते रहते है, दरवाजा तोड़ते है, चेहरे पे खरोचे देते हैं; वहीं बिहार के लाल शत्रुहन सिन्हा ने वादे के अनुसार प्रेम विवाह किया. देश की राजनीती के खिलाडी फारुख अब्दुल्ला और उनके बेटे ने अपनी बेटी को बेदखल कर दिया, तो सचिन पायलट ने उसका हाथ कभी नहीं छोड़ा.
सोच न गन्दी होती है, न साफ़- सुथरी. बलात्कार परिचायक है हमारी मानसिक दुर्बलता का. जावेद अख्तर जी का ये कहना कि बलात्कार का एक मात्र कारण औरत को देवी समझना हैं, उनकी मानसिक दुर्बलता से उपजी सोच है. उनका अनुभव कहता है की आपस में बात करने से लड़के उन्हें इज्ज़त देंगे. कैसे भूल गये जावेद जी, हमारे इतिहास को. क्या शिवा जी का पराजित स्त्रियों को माँ का दर्जा देना ये साबित करता है की उनका उन सभी से रोजाना बात होती थी ? क्या ह्युमायु ने रानी रूपवती से कभी बात की थी, जो उसने उनकी राखी की इज्ज़त रखी? हमारी संस्कृति के कारण ही अकबर ने मीरा का सम्मान किया,कृष्णा ने द्रौपदी की लाज रखी.
सिर्फ मुंबई का उदहारण देना उनकी संकुचित मानसिकता का परिचायक है. जब उन जैसे लोग नेता बन जाते हैं, तो भारत का परिचय इन्हीं शब्दों से , शहरों से करते है. लेकिन वो कभी भी शोभा डे के शब्दों का युवावों पे नकारात्मक असर पर प्रकाश नहीं देंगे क्यों की शहरों में ही चोर-चोर मोसेरे भाई होते है. गावों में आज भी भाई सिर्फ बहनों के भाई होते हैं.
उन्हें मुनवर राणा की पंक्तियाँ पढना चाहिए, जिनको जन्नत भी माँ के आँचल में दीखता है…..
very nice, i wish people are serious about love..
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Love it…Nice post Dr. Crassa!
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