समय है प्रतिकूल, भाग्य-विहीन मैं धूल,
पर माँ अब मैं लौट के नहीं आऊंगा,
माना, अर्जुन-कृष्णा की है प्रीत,
माना, तय है उनकी जीत,
मैं भी वचन अपना निभाउंगा,
इस कुरुक्षेत्र में मैं ही, अर्जुन से टकराउंगा।
धरा नहीं छोड़ती कांटो से भरे वृक्षों को,
तुमने तो ठुकराया, बिना आहार दिए मेरे मुख को,
माना, समय नहीं है दूर,
माना, काल भी है आतुर,
पर मैं अपनी तीरों से, बल अपना दिखाऊंगा,
इस कुरुक्षेत्र में मैं ही, अर्जुन से टकराउंगा।
अब मैं शिशु नहीं की स्तनपान कर पाउँगा,
ना मैं कुरुवंशी की राजन ही कहलाऊंगा।
माना, धर्म नहीं मेरा वसूल,
माना, कलंकित है मेरा खून,
पर, आखरी सांस तक दुर्योधन को बचाऊंगा,
इस कुरुक्षेत्र में मैं धुरंधर ही, अर्जुन से टकराउंगा।
Thanks Madvanthi
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Your poem was wonderful. And I’m a damn big fan of Karna. I like each and every post about him. And when somebody writes as beautiful a poem as you have written, it is hard to resist the ‘like’ button. 🙂
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