त्वरित – तरंगों से भगीरथ सा विचलित रहता हूँ


तेरी गहरी -गहरी आँखों में,
मैं गहन – गहन अध्ययन करता हूँ.
तेरे गहन – गहन इन नयनों का,
मैं गहरा अध्ययन करता हूँ.

तेरे सुर से इन साँसों में,
मैं मदिरा का अनुभव करता हूँ.
तेरी कमर की इस लचकता पे,
मैं भ्रमर सा गुंजन करता हूँ.

कभी आ जा भी तू,
साक्षात मेरे उपवन में,
नित रात्रि में स्वपन में,
तेरा अभिनन्दन करता हूँ.
पुष्प सी पुलकित हो,
मृग सी बिचरती है धरा पे,
तेरे यौवन के त्वरित – तरंगों से,
मैं भगीरथ सा विचलित रहता हूँ.

धनुष की प्रतयंचा सी,
तू कसी- कसी सी,
मैं राम सा तुझे कसने को,
हर पल में प्रबल रहता हूँ.
घनघोर घटा सी जुल्फे तेरी,
चन्द्रमुख को ढक लेती है जब,
चकोर सा व्याकुल -विचलित,
मैं तेरी आभा को तड़पता हूँ.

तेरी गहरी -गहरी आँखों में,
मैं गहन – गहन अध्ययन करता हूँ.
तेरे गहन – गहन इन नयनों का,
मैं गहरा अध्ययन करता हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कलम के खिलाफ लड़कियाँ


यूँ ही मेरे कलम के खिलाफ नहीं हैं लड़कियाँ,
जमाने के लिए सच्ची, पर मुझसे बईमान हैं लड़कियाँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

शकुंतला को जन्मते नहीं देखा


कौन कहता है की मैंने?
मेनका को नहीं देखा।
बस गर्भ से निकल कर,
धरती पे शकुंतला को रोते नहीं देखा।

पेट भरने को उसका,
खगचर भी तैयार हैं लाखों।
पर इतनी मेनकाओं के होते,
एक शकुंतला को जन्मते,
किसी ने नहीं देखा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो फिर से डेटिंग साइट पे सिंगल हो गयीं


सुबह हुई, फिर शाम हुई,
फिर रात तक वो परेशान हो गयीं.
एक बटन भी न खोल सका,
मैं चोली का उनके।
फिर अगली सुबह वो अपने,
कपडे -लत्ते समेटकर,
फिर से डेटिंग साइट पे सिंगल हो गयीं।

सजाया – सवारा कमरे को अपने,
फिर इत्र से बिस्तर भी महकाया।
Shakespeare की नयी किताब ले कर,
जैसे ही रोमियो – जूलिएट के किस्से,
सुनाने बैठा,
वो अपने अंगों का भार लिए,
मेरे सीने पे सवार हो गयीं।
और फिर अगली सुबह,
अपने कपडे-लत्ते समेट कर,
फिर से डेटिंग साइट पे सिंगल हो गयीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कहीं तिल बन कर ठहर जाएँ


तेरी काली – काली आँखों में हम काजल बनकर बह जाएँ,
तेरे गोरे – गोरे गालों पे कहीं तिल बन कर ठहर जाएँ.
इस देश – सीमा के विवादों से दूर, तुझे लेके कहीं बस जाएँ,
मेरे नन्हें – मुन्नें चार, मेरा नाम लेकर, हर सुबह तुझसे लिपट जाएँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

तू उड़ती है कैसे?


ए चिड़िया,
तू उड़ती है कैसे?
नन्हें परों पे हौसला लेकर।

सुबह – सुबह निकल आती है,
सबसे पहले अपने घोसलें से.
जाने क्या ढूंढती है?
तुझे क्या मिलता है?
यूँ चहक – चहक कर,
गुंजन करने में.

ए चिड़िया,
तू फुदकती है कैसे?
बाज के शहर में,
यूँ निडर होकर।

 

परमीत सिंह धुरंधर

नए तरीके से सील रहीं हैं सलवारें


कुछ नए तरीके से सील रहीं हैं सलवारें उनकी,
कुछ दर्जी का दोष है, कुछ उनकी जवानी का.
यूँ ही नहीं निकलते हैं लोग गलियों में,
कुछ गर्मी का असर है, कुछ उनकी जवानी का.
और कब तक बांधें वो भी लज्जावस अपनी साँसों को,
कुछ मेरी बाहों का असर है, कुछ उसकी जवानी का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इस शहर से उस शहर तक


मेरे दुश्मनों की कमी नहीं है,
इस शहर से उस शहर तक.
ता उम्र बस यही,
दौलत तो कमाया है.
मैं भले ही नास्तिक हूँ खुदा,
पर सारे जमाने को आस्तिक बनाया है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

लड़कियाँ शादी के बाद


वो जो कल तक इठलाती थीं,
अपनी अंगराई पे.
मुझे ठुकरा दिया,
किसी और की शहनाई पे.
शादी के बाद, जाने क्यों?
कुम्हलायी सी लगती हैं.
लड़कियाँ,
अक्सर शादी के बाद ही सही,
लेकिन अपनी आशिक की
परछाई को तरसती हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे गावँ का पता


यूँ ही नहीं हैं बहारें मेरी किस्मत में,
मैंने कइयों को रौंदा हैं, टकराने पे.
तूफानों को भी पता है, मेरे गावँ का पता,
यूँ ही नहीं मुख मोड़ लेती हैं आंधियाँ मेरे दरवाजे से.

 

परमीत सिंह धुरंधर