बहुत जलील हुआ हूँ पर अब भी मज़ा आता है.
हुस्न ही उनका ऐसा है, देखने के बाद नशा आता है.
मत पूछ क्या पाता हूँ बिना बाँहों में गए उनके,
लहरों में उतर के कौन सागर की गहराई नाप के आता है.
परमीत सिंह धुरंधर
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बहुत जलील हुआ हूँ पर अब भी मज़ा आता है.
हुस्न ही उनका ऐसा है, देखने के बाद नशा आता है.
मत पूछ क्या पाता हूँ बिना बाँहों में गए उनके,
लहरों में उतर के कौन सागर की गहराई नाप के आता है.
परमीत सिंह धुरंधर
अब खुदा भी नहीं पूछता मेरा हाले-करम,
अकेला रह गया हूँ उठा के तेरा जुदाई का गम.
मोहब्बत कभी भी इतनी शिद्दत से मत कर,
की उनका बिछुरना बन जाए जिंदगी का आखरी सितम.
परमीत सिंह धुरंधर
घर बसा लेने को वो कहती हैं मोहब्बत,
और आज भी एक ही घर में रहती है.
सजाती हैं – सवारती हैं दीवारों को दीवाली में,
हम फ़कीर दिया ना जलाये, तो ठोकर खा जाती हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
तरसने वाले तरसते रह गए,
उड़ाने वाले उड़ा ले गए.
हमें नहीं मालुम हुस्न और चिड़िया में अंतर,
शिकारी दाना दाल के, दोनों ले गए.
परमीत सिंह धुरंधर
तेरी पलकों पे सबेरा, तेरी पलकों से मेरी शाम है,
पर मेरी किस्मत में एक रात ही नहीं।
रोजा रखता हूँ, सजदा करता हूँ,
सब दिया मौला ने पर मेरी किस्मत में जन्नत ही नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
क्या ढूंढता है इन आँखों में तू,
सितारे चाहिए या चाँद ढूंढता है तू.
दे सकती हूँ चंद राते चांदनी की मैं,
या पूरा आसमान ढूंढता है तू.
जाम का मज़ा हलके-हलके छलका के पीने में हैं,
या एक बार में ही गटकना चाहता है तू.
किस्मत है तेरी, पूरा मज़ा ले,
या प्यास अपनी मिटाना चाहता है तू.
परमीत सिंह धुरंधर
कहाँ तक जला के रखूं उमिद्दों का दिया,
हवाओं का रुख तो मेरे हाथ में नहीं।
मोहब्बत तो बहुत है उनको हमसे,
रिश्तों को निभाना उनकी फितरत नहीं।
क्यों करते हो शिकायत हुस्न से,
वो क्या वफ़ा करे जब तेरी किस्मत नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
उम्र बढ़ रही है मेरी,
दिल अभी भी वहीँ है.
दुपट्टा नहीं अब आँचल है सीने पे,
पर निगाहें अभी भी वहीँ है.
कहती हैं हमसे हर बार की भूल जाओ,
कोई समझा दे उन्हें, तन ढल रहा है,
पर मेरी मुरादें अभी भी वहीँ हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
रातें पहले भी काली थी, राते अब भी काली हैं,
पहले उनका कमरा खाली था, अब मेरा कमरा खाली है.
सजा दे गयी ये कह के की अब हाथ न आउंगी,
मेरा दिल तो भर गया, दर्द से, उनका आज भी खाली है.
घूमती हैं जिसे थाम के बाजार में, तरसती हैं की कभी साथ में खा लें,
इधर मेरी भी थाली अकेली है, उधर उनकी भी थाली अकेली है.
परमीत सिंह धुरंधर
मयकदा और ये जाम तो है, हारे हुए सल्तनतो के लिए,
लूटा हुआ ये फकीर धुरंधर सिंह शौक रखता है आज भी तेरी लबो का.